प्रेम1

प्रेम1

1) प्रेमः

अल्लाह से प्रेम करने का अर्थः

अल्लाह से प्रेमः

अर्थात दिल का अल्लाह तआला से मानूस होना और उस की ओर झुकना और जो अल्लाह चाहे उस पर तुरंत हामी भरना,और दिल पर अल्लाह की याद का ग़ालिब होना।

अल्लाह से प्रेम करने की हक़ीक़त

अल्लाह की मुहब्बत का अर्थ उस की इबादत,विनम्रता,और उस के सम्मान से मुहब्बत करना,अर्थात मुहब्बत करने वाले के दिल में महबूब अल्लाह की महानता और उस का सम्मान हो,जो इस बात का तक़ाज़ा करे कि बंदा उस के आदेश का पालन करे और जिन चीज़ों से उस ने रोका है रुक जाये,और यही मुहब्बत ईमान और तौहीद की असल है,और इस की इतनी प्रतिष्ठायें हैं जिसे गिना नहीं जा सकता, और अल्लाह की मुहब्बत में से यह भी है कि उन जगहांे,ज़मानों(समय) और लोगों अथवा कार्यांे और कथनों आदि उन चीज़ों से प्रेम किया जाये जिन से अल्लाह तआला प्रेम करता है।

जैसा कि यह अनिवार्य है कि अल्लाह से प्रेम खालिस(शुद्व) अकेले अल्लाह के लिये हो,और यह फितरी मुहब्बत के विपरित नहीं है,जैसे बच्चे का अपने बाप से और बाप का अपने बच्चे से, और शिक्षक का अध्यापक से और अध्यापक का शिक्षक से प्रेम करना,या जैसे खाने, पीने, शादी, पनहाव और दोस्तों इत्यादि से प्रेम करना ।

हाँ हराम मुहब्बत अल्लाह की मुहब्बत में शिर्क करना है,जैसे मुश्रिकों का अपने बुतों और अपने वलियों से मुहब्बत करना,या जिन चीज़ों को नफ्स महबूब रखे उसे उन चीज़ो पर मुक़द्दम रखना जिन्हे अल्लाह महबूब रखता है,या उन ज़मानों (समय) जगहांे,और लोगों अथवा कार्यांे और कथनों आदि उन चीज़ों से प्रेम करना जिन से अल्लाह तआला प्रेम नहीं करता है,और यह बर्बादी है,अल्लाह तआला ने फर्मायाः {और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह के साझीदार दूसरों को ठहरा कर उन से ऐसा प्रेम रखते हैं जैसा प्रेम अल्लाह से होना चाहिये,और ईमान वाले अल्लाह से प्रेम में सख्त होते हैं“।}[अल बक़राः 165].

अल्लाह तआला से मुहब्बत की प्रतिष्ठाः

1- यही असल तौहीद है,और तौहीद की रूह यह है कि अकेले अल्लाह तआला के लिये मुहब्बत को खालिस किया जाये,बल्कि यही वास्तविक इबादत है,और तौहीद उस समय तक पूरा नहीं होगा जब तक कि बंदे की मुहब्बत अपने रब के लिये पूरी न हो जाये और सब मुहब्बत की जाने वाली चीज़ों से आगे और उन पर ग़ालिब न आ जाये,और उन पर इस का हुक्म न चले,वह इस प्रकार कि जिन चीज़ों को बंदा महबूब रखता है उन्हें इस मुहब्बत के अधीन करे जिस में बंदे की खुशी और उस की कामयाबी छुपी हुयी है।

2- दुखों के समय मुहब्बत करने वाले को तसल्ली मिलती है,मुहब्बत करने वाला मुहब्बत की लज़्ज़त के कारण अपने ऊपर आने वाले दुखों को भूल जाता है,और उस के लिये परेशानियों का झेलना सरल हो जाता है।

मुहब्बत,भय,और आशा जैसी की जाने वाली अल्लाह की कोई इबादत नहीं है। अल्लाह से मिलने का शौक़ ऐसी हवा है जो दिल पर चल कर दुनिया की चमक को समाप्त कर देती है।

3- पूर्ण नेमतें और अधिकतर प्रसन्नताः यह अल्लाह तआला की मुहब्बत के बिना प्राप्त नहीं हो सकती,तो दिल बेनियाज़ नहीं हो सकता, और उस की दोस्ती पूरी नहीं हो सकती और न वह आसूदा हो सकता है मगर अल्लाह की मुहब्बत से और उस की ओर मुतवज्जेह हो कर,अगर उसे मज़ा करने की सारी चीजें़ मिल जायें तो वह न तो मानूस होगा और न ही वह मुतमइन होगा मगर अल्लाह तआला की मुहब्बत से,अल्लाह तआला की मुहब्बत नफ्सों के सुकून का कारण है,और साफ सुथरे दिलों,पविन्न रूहांे, पाकीज़ा अक़्लों के निकट अल्लाह तआला की मुहब्बत,उस की उनसियत और उस से मिलने के शौक से अधिक मीठी,लज़ीज़,पविन्न,खुश करने वाली और अधिक बेहतर कोई चीज़ नहीं है,और वह

मिठास जिसे मोमिन अपने दिल में महसूस करता है हर मीठी चीज़ से उत्तम है,और उसे जो मज़ा इस कारण हासिल होगा वह हर मज़े से अच्छा और हर एक लज़्ज़तों से बढ़ कर होगा। «तीन चीज़ें जिस के अन्दर पाई जायेंगी वह उन के ज़रिये ईमान की मिठास पालेगाः अल्लाह और उस के रसूल उस के निकट सब से अधिक प्रिय हों,आदमी किसी से मुहब्बत न करे मगहर अल्लाह तआला के लिये,और कुफ्र में लौटने को ऐसे ही नापसंद करे जब कि अल्लाह तआला ने उसे बचा लिया है जैसे वह आग में डाले जाने को नापसंद करता है।»
(बुखारी,मुस्लिम,नसाई).

जिसे अल्लाह की मुहब्बत से सुकून और उनसियत न हो संसार में उस से अधिक कोई बदबख्त नहीं है.

अल्लाह की मुहब्बत प्राप्त करने वाले कारणः

हमारा रब जो सर्वशक्तिमान है वह उस से पे्रम करता है जो अल्लाह से प्रेम करता है और उस की निकटता ढूँडता है,और अल्लाह की मुहब्बत की प्राप्ति उस समय होगी जब बंदा अपने रब से हर एक चीज़ से अधिक प्रेम करे,अल्लाह की मुहब्बत हासिल करने के कारण विस्तार से इस प्रकार हैंः

1- कुऱ्आने करीम की तिलावत गौरो फिक्र और उस के अर्थाें और मतलब में विचार के साथ करना,जो व्यक्ति अल्लाह की किताब पर अमल करता है और उस की ओर ध्यान देता है तो उस के दिल में अल्लाह की मुहब्बत बैठ जाती है।

2- फर्ज़ नमाज़ोें के बाद नफ्ल नमाज़ के ज़रिये अल्लाह की निकटता प्राप्त करना।

«मेरा बंदा नफ्लों के ज़रिये मेरी निकटता ढूँडता रहता है यहाँ तक कि मैं उस से मुहब्बत करने लगता हूँ और जब मैं उस से मुहब्बत करने लगता हूँ तो मैं उस का वह कान हो जाता हूँ जिस से वह सुनता है और उस की आँख हो जाता हूँ जिस से वह देखता है और उस का हाथ हो जाता हूँ जिस से वह पकड़ता है और उस का पैर बन जाता हूँ जिस से वह चलता है,और अगर वह मुझ से माँगे तो मैं अवश्य दूँगा,और अगर वह मेरी पनाह माँगे तो अवश्य मैं उसे पनाह दूँगा“।» (हदीसे कु़दसी,बुखारी)

3- ज़ुबान,दिल और अमल से हर समय हर हाल में अल्लाह का जि़क्र करना।

4- जिन चीज़ों को अल्लाह पसंद करता है उन्हें नफ्स की इच्छाओं और हवस पर तरजीह देना।

{अल्लाह उन से प्रेम करता है और वह अल्लाह से प्रेम करते हैं“।} [अल माइदाः 54].

5- दिल का अल्लाह तआला के नामों,उस की विशेषताओं का पढ़ना और मुताला करना अथवा उस के विषय में जानकारी प्राप्त करना।

6- अल्लाह तआला की भलाई,उस का एहसान, और उस की ज़ाहिरी और छिपी हुयी नेमतों को देखना।

7- पूर्ण प्रकार से दिल को अल्लाह के दानों हाथों के बीच विनय कर देना।

8- रात की अंतिम तिहाई में जब हमारा पालनहार निचले आसमान पर उतरता है उस समय अल्लाह तआला के साथ एकांत में होना,अल्लाह तआला के साथ तनहाई मे उस से गुप्तवार्ता (सरगोशी) करे,उस की किताब की तिलावत करे और अदब के साथ खड़े हो कर नमाज़ पढे़ फिर तोबा और क्षमा माँग कर उसे संपन्न करे।

9- (अल्लाह से) मुहब्बत करने वाले और सच्चों के संग बैठना,और उन की अच्छी बातों को ऐसे चुन लेना जैसे अच्छे फलों को चुन कर ले लिया जाता है,और उन के बीच चुप रहना,हाँ जब बोलने की आवश्यक्ता हो और यह स्पष्ट हो जाये कि यहाँ अधिक की गुन्जाइश और इस में लोगों के लिये लाभ है।

10- हर उन कारणों से दूर रहना जो दिल और अल्लाह के बीच आड़े आयें।

जब अल्लाह तआला बंदे से मुहब्बत करता है तो उस से बंदे को क्या लाभ मिलते हैंः

जिस व्यक्ति से अल्लाह तआला मुहब्बत करता है उसे हिदायत देता है और उसे अपने क़रीब करता है,नबी ने फरमायाः «अल्लाह तआला फरमाता हैः मैं अपने बंदे के साथ उस के गुमान अनुसार मामला करता हूँ,जब वह मुझे याद करता है तो मैं उस के साथ होता हूँ,अगर वह मुझे अपने दिल में याद करता है तो मैं भी उस को अपने दिल में याद करता हूँ,और अगर वह भरी जमात में याद करता है तो मैं उस से उत्तम जमात में याद करता हूँ,अगर वह मुझ से एक बालिश्त क़रीब होता है तो मैं उस से एक हाथ क़रीब होता हूँ और अगर वह मुझ से एक हाथ बराबर क़रीब होता है तो मैं उस से एक मीटर के बराबर क़रीब होता हूँ,और अगर वह मेरे पास चल कर आता है तो मैं उस के पास दौड़ते हुये चला आता हूँ» (बुखारी).

जब जब बंदा अपने रब से डरेगा अधिक हिदायत की ओर आगे बढ़ेगा,और जब जब अल्लाह तआला उस से प्रेम करेगा उस की हिदायत में बढ़ोतरी करेगा,और जब उसे हिदायत मिल जायेगी तो उस की परहेज़गारी भी बढ़ जायेगी।

जिस व्यक्ति से अल्लाह तआला प्रेम करता है धरती पर वह मक़बूल हो जाता हैः

अर्थात जिस बंदे से अल्लाह तआला मुहब्बत करता है वह लोगों में मक़बूल हो जाता है, लोग उस की ओर झुकते हैं,उस से प्रसन्न होते हैं, उस की प्रशंसा करते हैं,और काफिर के अतिरिक्त हर एक चीज़ उस से प्रेम करती है,क्यांेकि वह अल्लाह ही से मुहब्बत नहीं करता तो वह अल्लाह के चहेतों से कैसे मुहब्बत करेगा?!रसूलुल्लाह ने फरमायाः «अल्लाह तआला जब किसी बंदे से प्रेम करता है तो जिब्रील को बुलाता है,और कहता हैः मैं फलाने से प्रेम करता हूँ तुम भी उस से प्रेम करो,फरमायाः कि जिब्रील उस से मुहब्बत करने लगते हैं फिर वह आसमान में पुकार के कहते हैंः बेशक अल्लाह तआला फलाने से प्रेम करते हैं तुम भी उस से प्रेम करो,पस आसमान वाले उस से प्रेम करने लगते हैं,फरमायाः कि फिर धरती में उस के लिये मक़बूल (प्रिय) होना लिख दिया जाता है।» (मुस्लिम),

इसी प्रकार जब अल्लाह तआला किसी से प्रेम करता है तो उस की अच्छी तरह से देख भाल करता है,और हर चीज़ को अपनी पैरवी बना देता है,उस के लिये हर कठिनाई सरल कर देता है और दूर को क़रीब कर देता है,और उस पर दुनियावी मामलों को आसान बना देता है जिस की वजह से वह थकावट और परेशानी महसूस नहीं करता,अल्लाह तआला ने फरमायाः {बेशक जो ईमान लाये हैं और जिन्हों ने नेक अमल किया है उन के लिये अल्लाह रहमान मुहब्बत पैदा कर देगा“।}[मरयमः 96].

जिस से अल्लाह तआला प्रेम करता है अपनी संगति उस के साथ कर देता हैः जब अल्लाह तआला बंदे से मुहब्बत करता है तो वह उस के साथ होता है उस की हिफाज़त करता है और उस की देख रेख करता है और किसी ऐसे व्यक्ति को मुसल्लत नहीं करता जो उसे तकलीफ या उसे नुक़्सान पहुँचायें,और हदीसे कुदसी में है,रसूलने फरमायाः «बेशक अल्लाह तआला ने फरमायाः जो मेरे महबूब से दुश्मनी करे मैं उस के संग युद्ध छेड़ देता हूँ,फ्राइज़ के अतिरिक्त मेरी प्रिय चीज़ों में से «किसी एक चीज़ के ज़रिये जब बंदा मेरी निकटता प्राप्त करता है तो उस से अधिक प्रिय मेरे लिये कोई चीज़ नहीं है,मेरे बंदे नवाफिल के ज़रिये मेरी निकटता प्राप्त करने की कोशिश में लगा रहता है यहाँ तक कि मैं उस से मुहब्बत करने लगता हूँ,और जब मैं उस से मुहब्बत करने लगता हूँ तो मैं उस का वह कान बन जाता हूँ जिस से वह सुनता है,वह आँख बन जाता हँू जिस से वह देखता है,वह हाथ बन जाता हूँ जिस से वह पकड़ता है और वह पैर बन जाता हूँ जिस से वह चलता है,अगर मुझ से माँगता है तो मैं उसे देता हूँ,और अगर मुझ से पनाह माँगता है तो मैं उस का अपनी पनाह में ले लेता हूँ,और मैं अपने फैसलों में से किसी भी चीज़ के करने उतना आगे पीछे नहीं होता जिस क़दर मोमिन बंदे की रूह निकालने में होता हूँ,क्यांेकि वह मौत को अप्रिय रखता है,और मुझे उस को कष्ट पहुँचाना नापसंद है» (बुखारी)

सच्चे ईमान में खुशियों का जीवन और अधिक प्रसन्नतायें हैं,जैसे अल्लाह के साथ कुफ्र में रूहों की मौत है और दुख ही दुख है।

जिस से अल्लाह तआला मुहब्बत करता है उस की प्रार्थना स्वीकारता हैः अपने मोंमिन बंदों से अल्लाह की मुहब्बत की दलीलों में से एक दलील यह है कि अल्लाह तआला उन की दलीलों को क़बूल करता है और जब वे आकाश की ओर हाथ उठा कर कहते हैंः हे हमारे रब तो उन पर अपनी नेमतों की वर्षा करता हैएअल्लाह तआला ने फरमायाः {और जब मेरे बंदे मेरे बारे में आप से सवाल करें तो कहदें कि मैं बहुत की क़रीब हँू,हर पुकारने वाले की पुकार को जब कभी भी वह मुझे पुकारे मैं क़बूल करता हूँ,इस लिये लोगों को भी चाहिये कि वे मेरी बात मानें और मुझ पर ईमान रखें,यह उन की भलाई का कारण है“।}[अल बक़राः 186].

और सलमान फारसी से रिवायत है,कहते हैंः रसूलुल्लाह ने फरमायाः «निःसंदेह अल्लाह तआला जीवित दाता है,जब बंदा उस की ओर अपने दोनों हाथ उठा कर माँगता है तो उन्हें खाली वापिस करने से वह लजाता है।» (त्रिमिज़ी).

जब अल्लाह तआला किसी बंदे से मुहब्बत करता है तो फरिश्तों को मुतय्यन कर देता है कि उस के लिये अल्लाह से क्षमा माँगें,फरिश्ते उस के लिये अल्लाह तआला से क्षमा माँगते हैं जिस से अल्लाह तआला मुहब्बत करता है और फरिश्ते उस के लिये अल्लाह तआला से दया माँगते हैं,अल्लाह तआला फरमाता हैः {अर्श के उठाने वाले और उस के आस पास के फरिश्ते अपने रब की तस्बीह तारीफ के साथ करते हैं और उस पर ईमान रखते हैं और ईमान वालांे के लिये इस्तिगफार करते हंै,कि हमारे रब तू ने हर चीज़ को अपनी दया और ज्ञान से घेर रखा है तो तू उन्हें माफ कर दे जो माफी माँगे और तेरे रास्ते की पैरवी करे और तू उन्हें नरक के अज़ाब से भी सुरक्षित रख“।}[ग़ाफिरः 7].

और अल्लाह तआला फरमाता हैः {क़रीब है कि आकाश अपने ऊपर से फट पड़े और सारे फरिश्ते अपने रब की तस्बीह अपने रब की प्रशंसा के साथ बयान कर रहे हैं और धरती वालों के लिये क्षमा याचना कर रहे हैं,खूब समझ रखों कि अल्लाह ही माफ करने वाला और दया करने वाला है“।}[अश्शूराः 5].

जब अल्लाह तआला किसी बंदे से प्रेम करता है तो उसे नेक काम पर जमा देता हैः रसूलुल्लाह ने फरमायाः «जब अल्लाह तआला किसी बंदे के साथ भलाई का इरादा करता है तो उसे लोगों में प्रिय बना देता है, पूछा गया प्रिय बना देता है इस का क्या अर्थ ? फरमायाः अल्लाह तआला उस की मौत से पहले उस पर भलाई के कामों को सरल कर देता है, फिर उस पर उसे जमाये रखता है।» (अहमद).

जब अल्लाह तआला किसी बंदे से प्रेम करता है तो मरते समय उस की सुरक्षा करता हैः

जब अल्लाह तआला किसी बंदे से प्रेम करता है तो मरते समय उस की सुरक्षा करता है और मरते समय उसे शांति प्रदान करता है और उसे हक़ पर जमाये रखता है,अल्लाह तआला अपने फरिश्तों को उस के पास भेजता है जो उस की जान को सरलता से निकालते हैं और मौत के समय उसे (ईमान पर) जमाये रखते हैं और उसे जन्नत की खुशखबरी सुनाते हैं,अल्लाह तआला ने फरमायाः {बेशक जिन लोगों ने कहा कि हमारा रब अल्लाह है फिर उसी पर जमे रहे उन के पास फरिश्ते आते हैं कि तुम कुछ भी भयभीत और दुखी न हो उस जन्नत की खुशखबरी सुन लो जिस का तुम से वादा दिया गया है“।}[फुस्सिलतः 30].

जब अल्लाह तआला अपने बंदे से प्रेम करेगा तो उसे हमेशा जन्नत में रखेगाः

जिस से अल्लाह तआला प्रेम करेगा उसे प्रलोक में अपनी जन्नत में रखेगा, जिस से अल्लाह तआला प्रेम करता है उस की उदारता उस पर इस प्रकार होगी जिस के विषय में कोई सोच भी नहीं सकता और न किसी के दिल में वह चीज़ आसकती है,अल्लाह तआला जिन से प्रेम करता है उन के लिये ऐसी जन्नत का वादा किया है जिस में वह सब होंगी जिस की लोग इच्छा करेंगे,जैसा कि हदीसे कुदसी में है,नबी ने फरमायाः «अल्लाह तआला ने कहाः मैं ने अपने नेक बंदों के लिये ऐसी चीजें़ तय्यार की हैं जिन्हें न तो किसी आँख ने देखी होगी और न किसी कान ने सुना होगा और न ही किसी आदमी के दिल में खयाल आया होगा,अगर चाहो तो यह (कुऱ्आन की आयत) पढ़ ला» {कोई पराणी नहीं जानता जो कुछ हम ने उन की आँखों की ठंडक उन के लिये छिपा रखी है“।}(बुखारी).

दुनिया में मज़ा नहीं मिल सकता मगर अल्लाह तआला की मुहब्बत और उस की पैरवी कर के, और न ही जन्नत में मज़ा मिल सकता है मगर अल्लाह तआला के दीदार से और उसे देख कर के।

अल्लाह तआला का बंदे से मुहब्बत करने के फलों में से एक फल बंदे का अल्लाह तआला को (स्वर्ग में) देखना हैः

अल्लाह तआला अपने जिन बंदों से मुहब्बत करता है उन के सामने अपना नूर प्रकट करके ज़ाहिर होगा,तो लोगों ने उस से उत्तम कोई चीज़ देखी ही न होगी,जैसा कि रिवायत में है कि नबी ने चैदहवीं की चाँद की ओर देख कर फरमायाः

«निःसंदेह तुम अपने रब को उसी प्रकार देखोगे जैसे तुम इस चाँद को देख रहे हो,तुम्हें उस के देखने में कोई परेशानी नहीं होगी,अगर तुम इस की ताक़त रख सको कि सूरज निकलने और सूरज डूबने से पहले वाली नमाज़ों को फौत होने न दो तो अवश्य ऐसा करो अर्थात इन नमाज़ों को न छोड़ो,फिर आप ने कुऱ्आन की ये आयत पढ़ी»ः {और अपने रब की पविन्नतागान तारीफ के साथ सूरज निकलने से पहले भी और डूबने से पहले भी करें“।}(बुखारी).

मुहब्बत के विषय में नियम और अलर्टः

1- अल्लाह तआला का किसी बंदे से प्रेम करने का यह अर्थ नहीं है कि उस पर मुसीबतें और आज़माइशें नहीं आयेंगीः रसूलुल्लाह ने फरमायाः «निःसंदेह बड़ा बदला बड़ी आज़माइश से मिलता है,और जब अल्लाह तआला किसी बंदे से मुहब्बत करता है तो उन्हंे आज़माता है,तो जो प्रसन्न हुआ उस के लिये प्रसन्नता है और जो नाराज़ हुआ उस के लिये अप्रसन्नता है।» (त्रिमिज़ी)

अल्लाह तआला बंदे को अनेक प्रकार की आज़माइशों में डालता है ताकि उसे गुनाहों से पाक साफ कर दे और उस के दिल को दुनियावी कामों से खाली कर दे,अल्लाह तआला ने कहाः {”और बेशक हम तुम्हारी परिक्षा लेंगे ताकि तुम में से जिहाद करने वालों और सब्र करने वालों को देख लंे,और तुम्हारी हालतों की भी जाँच कर लें“। [मुहम्मदः 31].

और अल्लाह तआला ने फरमायाः {और हम किसी न किसी तरह तुम्हारा इम्तेहान ज़रूर लेंगे,दुश्मन के डर से,भूक प्यास से,माल व जान,और फलों की कमी से,और सब्र करने वालों को खुशखबरी दे दीजिये,उन्हें जब कभी भी कोई कठिनाई आती है तो कहा करते हैं कि हम तो खुद अल्लाह के लिये हैं और हम उसी की ओर लौटने वाले हैं,यही हैं जिन पर उन के रब की रहमत और नवाजि़शें हैं और यही लोग सच्चे रास्ते पर हैं“।}[अल बक़राः 155-157].

2- बंदा जब अपने रब की नाफरमानी करता है तो मुहब्बत में कमी आ जाती है,और उस की पूर्णता खतम हो जाती है,ईमान की तरह मुहब्बत की असल और पूर्णता है,गुनाहों के एतबार से पूर्णता में कमी आती है,और जब बंदा संदेह और बड़े कपटाचार (नेफाक़) के दायरे में आ जाता है तो असल चली जाती है, बल्कि पूर्ण रूप से खतम हो जाती है,तो जिस के दिल में अल्लाह तआला की मुहब्बत नहीं होगी वह व्यक्ति काफिर,मुर्तद और पक्का मुनाफिक़ होगा,दीन में उस का कुछ हिस्सा बाक़ी नहीं रह जायेगा,अलबŸाा गुनहगारों के विषय में यह नहीं कहा जायेगा कि उन के अन्दर अल्लाह की मुहब्बत नहीं है बल्कि यह कहा जायेगा कि इन के दिलों में अल्लाह की मुहब्बत अधूरी है,इसी को देखते हुये उन से मामला भी किया जायेगा,नबी ने फरमायाः «यदि तुम गुनाह नहीं करोगे तो अल्लाह तआला ऐसी क़ौम को पैदा करेगा जो गुनाह करेंगे फिर अल्लाह तआला उन्हें क्षमा करेगा।»
(मुस्नदे अहमद)

3- अल्लाह तआला की मुहब्बत उस प्राकृतिक मुहब्बत के विपरित नहीं है जिस की ओर नफ्स का झुकाव होता है जैसे खाना पीना,महिलायें अदि,नबी ने फरमायाः «मेरे लिये दुनिया की दो चीज़ें महिलायें और खुशबू प्रिय बना दी गई हैं।» (अहमद),

”असली आज़ादी दिल की है जो शिर्क और इच्छाओं अथवा संदेह से आज़ाद हो,और असल बंदगी दिल की बंदगी है“

तो यहाँ दुनिया में कुछ चीज़ें ऐसी हैं जिन की मुहब्बत शिर्क नहीं है,क्यांेकि नबी ने उन से मुहब्बत की है,इस लिये इन्सान के लिये जायज़ है कि वह दुनियावी चीज़ों से मुहब्बत करे जब तक कि वे चीज़ें हराम न हों।

4- जिसने किसी से अल्लाह जैसी मुहब्बत की उस ने शिर्क किया,अल्लाह तआला फरमाता हैः {और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह के साझीदार दूसरों को ठहरा कर उन से ऐसे प्रेम रखते हैं जैसा प्रेम अल्लाह से होना चाहिये और ईमान वाले अल्लाह से प्रेम में सख्त होते हैं,काश कि मूर्तिपूजक जानते जब कि अल्लाह के अज़ाबों को देख कर सभी ताक़त अल्लाह ही को है और अल्लाह सख्त अज़ाब देने वाला है“।}
[अल बक़राः 165].

नबी ने फरमायाः «निःसंदेह अल्लाह के निकट सब से प्रिय कार्य अल्लाह के लिये मुहब्बत करना और अल्लाह के लिये नफरत करना है»(अहमद).

और आयत में उस व्यक्ति के लिये सखत धमकी है जिस का किसी से मुहब्बत करना इबादत और सम्मान के एतबार से अल्लाह की तरह हो,

अल्लाह तआला ने फरमायाः {कह दीजिये कि अगर तुम्हारे बाप,तुम्हारे बेटे और तुम्हारे भाई और तुम्हारी बीवियाँ और तुम्हारे वंश और कमाया धन और वह तिजारत जिस की कमी से तुम डरते हो और वे घर जिन्हें तुम प्यारा रखते हो यह तुम्हें अल्लाह और उस के रसूल और अल्लाह की राह में जिहाद से अधिक प्यारे हंै,तो तुम इन्तेज़ार करो कि अल्लाह तआला अपना अज़ाब ले आये“।}[अŸाोबाः 24].

और आयत में उस व्यक्ति के लिये सखत धमकी है जिस के निकट ये आठ चीज़ें अल्लाह तआला से अधिक प्रिय हों,और अनस से रिवायत है रसूलुल्लाह ने फरमायाः «तुम में से से कोई उस वक़त तक मोमिन नहीं हो सकता जब तक मैं उस के निकट उस की अवलाद,उस के बाप और सब लोगों से अधिक प्रिय न हो जाऊँ» (इब्ने माजा).

5- मोमिनों को छोड़ कर मुश्रिकों के प्रति वफादारी और प्यार जताना यह अल्लाह की मुहब्बत के विपरित हैः मुश्रिक के शिर्क और उस के (झूटे) दीन के कारण,अल्लाह के लिये मुहब्बत करना और अल्लाह के लिये नफरत करना ईमान का महान तथ्य (असल) है,अल्लाह तआला ने फरमायाः {मोमिनों को चाहिये कि ईमान वालों को छोड़ कर काफिरों को अपना दोस्त न बनायें,और जो ऐसा करेगा वह अल्लाह की किसी पक्ष में नहीं,लेकिन यह कि उन के किसी तरह की हिफाज़त का इरादा हो“।}
[आले इमरानः 28].

अल्लाह तआला ने मोमिनों को काफिरांे के संग सहकारिता (मुवालात) से मना किया है और यह स्पष्ट किया है कि जो ऐसा करेगा उसे अल्लाह तआला की मिन्नता से कुछ नहीं मिलेगा,मिन्न से सहकारिता और दुश्मन से भी सहकारिता दोनों एक दूसरे के विपरित हैंः {लेकिन यह कि उन के किसी तरह की हिफाज़त का इरादा हो“।}
[आले इमरानः 28].

और अल्लाह तआला ने उन से सहकारिता की अनुमति दी है जब कि इस बात का डर हो कि बिना सहकारिता के वे मुसलमानों को ठीक से रहने नहीं देंगे,तो उस समय ज़ाहिरी तौर पर उन से घुल मिल जाना जायज़ है जब कि दिल ईमान औैर काफिरों

की घृणा से संतुष्ट हो,जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमायाः {उस के सिवाय जिसे मजबूर किया जाये और उस का दिल ईमान पर क़ायम हो“।}
[अन्नहलः 106].

प्यार की चमक

जब हमारे नबी को दुनियावी जीवन और अल्लाह तआला से मुलाक़ात के बीच चुनने को कहा गया तो आप ने फरमायाः «बल्कि मुझे तो ऊपर वाले रफीक़ (अल्लाह तआला) से मिलना है» (अहमद),

आप ने अल्लाह तआला की मुहब्बत और उस की मुलाक़ात को चुना और उसे प्रमुखता दी और दुनिया की हवस,आराम और उस की लज्ज़तोें की मुहब्बत पर मुक़द्दम किया।

अल्लाह तआला की मुहब्बत की निशानियांे में से उस का अधिकतर जि़क्र करना और उस से मिलने की इच्छा करना,जो किसी से मुहब्बत करता है उसे अधिकतर याद करता है और उस से मिलने को पसंद करता है ।

अल रुबय्य बिन अनस


2-आशाः

नबी ने फरमायाः ”सरलता पैदा करो कठिनाई में न डालो, खुशखबरी सुनाओ नफरत न फैलाओ“ (बुखारी)

उस(आशा) का अर्थ

आशा अर्थातः

अल्लाह तआला के वजूद,उस की कृपा,उस की दया को महसूस करना,उस की उदारता और उस के एहसानात से खुश होना और उस पर भरोसा करना,वह उभारने वाला है दिलों को अल्लाह और उस की जन्नत की ओर उभारता है,अल्लाह तआला ने फरमायाः {और जो भी कोई बुराई करे या खुद अपने ऊपर ज़ुल्म करे,फिर अल्लाह से क्षमा माँगे तो अल्लाह को क्षमा करने वाला,दया करने वाला पायेगा“।}
[अन्निसाः 110].

आशा की कि़स्मेंः

आशा तीन प्रकार के हैं,उन में दो अच्छे हैं और एक बुरा और धोका हैः

1- उस व्यक्ति की आशा जो अल्लाह की रोशनी में अल्लाह की पैरवी करे,वह अल्लाह के फल (सवाब) की आशा करे।

2- उस व्यक्ति की आशा जो गुनाह करके तोबा करले,वह अल्लाह तआला से क्षमा,गुनाहों के मिटाने,उसे दरगुज़र करने और उसे छुपाने की आशा करे।

3- उस व्यक्ति की आशा जो कोताही,बुराई और गुनाहों में हद से बढ़ जाये और बिना अमल के अपने रब की दया और क्षमा की आशा करे!! यह धोका,तमन्ना,और झूटी आशा है इसे कभी भी अच्छी उम्मीद नहीं कह सकते,और मोमिनों की उम्मीद केवल उम्मीद नहीं है बल्कि उस में अमल मिला हुआ है,अल्लाह तआला ने फरमायाः {बेशक जिन्होंने ईमान क़बूल किया और हिजरत की और अल्लाह की राह में जिहाद किया वही अल्लाह की रहमत की उम्मीद रखते हैं,और अल्लाह बड़ा बख्शने वाला और रहम करने वाला है“।}[अल बक़राः 218].

आशा के दरजेः

आशा के अनेक दरजे और मरतबे हैं जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के लिये ऊँचे और बुलंद होते हैं और यह मरतबे इस प्रकार हैंः

1. ऐसी आशा जो इबादत में प्रयास करने पर उभारेएऔर इबादत करने वाले के दिल में आनंद पैदा करेएअगरचे वह इबादत कठिन और मुश्किल ही क्यांे न हो जिस की वजह से वह गुनाहों और बुराइयों से बचे।

2. मेहनती लोगों की आशा उन चीज़ों के छोड़ने में जिन से उन के नफ्स मानूस हैंएऔर जो उन की

आदत में से हैं,और उन्हें उन चीज़ों से फेर दें जो उन के रब और उन के पैदा करने वाले को प्रिय हैं,और (उन चीज़ोें को अपनायें) जो उन के दिलों को अल्लाह तआला के लिये एकजुट करदें।

3-दिलों के रब की आशा करनाः अर्थात पैदा करने वाले से मिलने की आशा,जो अल्लाह तआला से मिलने और केवल उसी से दिली लगाव रखने पर उभारे,यह आशा सब से बेहतर और सर्वाेच्च प्रकार की आशा है,अल्लाह तआला ने फरमायाः {तो जिसे भी अपने रब से मिलने की उम्मीद हो उसे चाहिये कि नेकी के काम करे और अपने रब की इबादत में किसी को भी शरीक न करे“।}[अल कहफ़ः 110].

और अल्लाह तआला ने फरमायाः {जिसे अल्लाह से मिलने की उम्मीद हो तो अल्लाह का मुक़र्रर किया हुआ समय ज़रूर आने वाला है,और वह सुनने वाला सब कुछ जानने वाला है“।}
[अल अनकबूतः 5].

जिसे किसी चीज़ की आशा होगी वह उसे माँगेगा।

आशा का तअल्लुक अल्लाह तआला,उस के नामों और उस की विशेषताओं से हैः

आशा करने वाला व्यक्ति (अल्लाह तआला) की आज्ञापालन पर पाबंदी करेगा,ईमान के तक़ाज़ों पर अमल करेगा,वह अल्लाह तआला से इस बात की उम्मीद रखेगा कि वह उसे न भटकाये, और उस के अमल को क़बूल करे, उसे रद्दी की टोकरी में न डाले,और उस के अज्रो सवाब को कई गुना बढ़ाये,तो बंदा उन ज़रियों को ढूँडता है जिन की वह शक्ति रखता है,वह अल्लाह तआला के नामों और उस की विशेषताओं के ज्ञान की उम्मीद करता है,वह ये जानता है कि उस का मामला उस दया करने वाले के साथ है जो प्रेम करने वाला,आभारी,करम करने वाला,अधिक देने वाला,क्षमा करने वाला और नरमी करने वाला है,तो ये इस दुनिया में भयभीत है पर सर्वशक्तिमान रब से मुलाक़ात के समय सेफ्टी की आशा करता है।

आशा के फलः

1- आशा उम्मीद करने वाले के भीतर अच्छे कर्मों और नेक अमल के प्रयास को बढ़ाता है।

2- आशा करने वाला व्यक्ति नेकी के कामों पर पाबंदी करता है,हालात चाहे जिस प्रकार बदल जायें अथवा तंग हो जायें।

3- आशा करने वाला व्यक्ति अल्लाह की ओर मुतवज्जेह होता है,उस से सरगोशी करता है,और माँगने में नरमी दिखाता और गिड़गिड़ाता है।

4- आशा करने वाला व्यक्ति बंदगी,निर्धनता और अल्लाह तआला के समीप आवश्यक्ता को ज़ाहिर करता है,और वह अल्लाह तआला के फज़्ल और उस के एहसान से पलक झपकने के बराबर भी बेनियाज़ नहीं होता।

5- आशा करने वाले व्यक्ति को अल्लाह तआला के वजूद और उस की उदारता का यक़ीन होता है,अल्लाह तआला सब से अधिक दानी और अधिकतर देने वाला है,वह इस बात को पसंद करता है कि उस के बंदे उस से गिड़गिड़ा कर माँगें,और उस से आशा रखें।

6- आशा बंदे को अल्लाह तआला की मुहब्बत की चैखट पर डाल कर उसे मुहब्बत के कमाल (पूर्णता) तक पहुँचा देती है,जब जब उस की आशा बढ़ेगी और जिस की वह आशा रखता है उसे मिल जायेगी तो अपने रब के लिये उस की मुहब्बत,शुक्र और प्रसन्नता में बढ़ोतरी हो जायेगी,और ये बंदगी के तक़ाज़ों और उस के अर्कान में से है।

आशा करने वाला हमेशा अल्लाह तआला से उम्मीद करता है,उस से डरता है और अल्लाह तआला के साथ अच्छा गुमान करते हुये अपने रब की कृपा की उम्मीद रखता है। मोमिन ने अपने रब के साथ अच्छा गुमान किया तो उस ने अच्छा अमल भी किया,और धर्मभ्रष्ट ने अपने रब के साथ बुरा गुमान किया तो उसने बुरा अमल भी किया। आप की जानकारी के लिये,अल्लाह तआला के साथ अच्छा गुमान करने में से है कि अल्लाह तआला उसे बर्बाद नहीं होने देगा जो उस की ओर पनाह ढूँडेगा।

7- आशा बंदे को अल्लाह तआला का शुक्र अदा करने के लिये उभारती है,क्योंकि नेमतों के कारण शुक्र अदा करने का जो हक़ बनता है उस की ओर ये प्रेरित करती है और यही बंदगी का सारंश (खुलासा) है।

8- अल्लाह तआला के नामों और उस की विशेषताओं का ज्ञान प्राप्त होता है,अल्लाह तआला दया करने वाला,करम करने वाला,दानशील,क़बूल करने वाला,सुन्दर और बेनियाज़ है,अल्लाह की ज़ात पविन्न और अधिकतर महान है!

9- आशा उस चीज़ की प्राप्ति का कारण है जिसे बंदा हासिल करना चाहता है,और मतलूब के प्राप्त होने से बंदे का हौसला बढ़ता है,अथवा उसे अधिक माँगने और अल्लाह की ओर मुतवज्जेह होने पर सहायता मिलती है,इस प्रकार हमेशा बंदे के ईमान में बढ़ोतरी होती रहती है और वह अल्लाह का क़रीबी बन जाता है।

10- क़यामत के दिन मोमिन उन चीज़ांे के हासिल होने से खुश होंगे जिस की वे उम्मीद करते

हैं जैसे अल्लाह की प्रसन्नता,स्वर्ग,और उस का दीदार,और यह सब बंदों की उम्मीद और अल्ललाह से डरने के बक़द्र होगा।

आशा के अह्काम और उस पर चेतावनियाँः

1- मोमिन के निकट डर आशा को और आशा डर को अनिवार्यकर्Ÿाा (मुस्तलज़म) है,इसी लिये ऐसी जगहों में आशा करना अच्छा समझा जाता है जहाँ पर डर का पाया जाना अच्छा समझा जाता हैः

{तुम्हें क्या हो गया है कि तुम अल्ला की बरतरी पर यक़ीन नहीं करते“।}[नूहः 13].

और अल्लाह तआला ने फरमायाः ¿”ईमान वालों से कह दें कि वह उन लोगों को क्षमा कर दिया करें जो अल्लाह के दिनों की उम्मीद नहीं रखते“}[अल जासियाः 14].

अर्थाथ अपने ऊपर आने वाले अल्लाह के अज़ाब से नहीं डरते जैसा कि इन से पहली उम्मतों में अज़ाब आया और उन्हें हलाक और बर्बाद कर दिया गया।

2- आशा दवा है हम उस समय उस के मुहताज होते हैं जबः

- जब नफ्सों पर मायूसी छा जाये फिर इबादत को छोड़ दिया जाये।

- जब आदमी पर इस क़दर डर ग़ालिब हो जाये कि वह स्वयं को और अपने घर वालों को हानि पहुँचाने लगे,अर्थात उस का डर शरई हद को पार कर जाये,तो उस समय उसे बदलने की और एक ऐसी चीज़ की आवश्यक्ता है जो उसे संतुलित (मोतदिल) करे और वह आशा है जो मोमिन की सामान्य स्तिथि होती है।

3- आशा मायूसी की विपरित है,और मायूसी कहते हैं अल्लाह की रह्मत के छूट जाने को याद किया जाये,और फिर अल्लाह तआला से ये नेमत माँगने में दिली तौर से न तलब किया जाये, नाउम्मीदी गुमराही और कुफ्र का कारण होती है, अल्लाह तआला फरमाता हैः {और अल्लाह की रहमत से मायूस न हो,बेशक अल्लाह की रहमत से वही मायूस होते हैं जो काफिर होते हैं“।}[यूसुफः 87].

अगर तारजू़ लाया जाये और मोमिन के डर और आशा को तौला जाये तो दोनों बराबर होंगे। eमैं इस बात को पसंद नहीं करता कि मेरा हिसाब मेरे पिता लें,मेरा रब मेरे पिता से बेहतर है

इमाम सुफ्यान सौरी

इबादत बिना डर और उम्मीद के पूरी नहीं हो सकती,डर के कारण मना की हुयी चीज़ों से रुकेगा और आशा के कारण अधिकतर अच्छा कर्म करेगा।

इमाम इब्ने कसीरः


3) डरः

”और अल्लाह तआला अपने आप से डरा रहा है“। {आले इमरानः 30}.

इस का अर्थ

अल्लाह तआला से डरने का अर्थ महान दिली इबादतें हैं,अल्लाह तआला ने फरमायाः {यह शैतान ही है जो अपने दोस्तों से डराता है,इस लिये तुम उन से न डरो और मुझ से ही डरो अगर तुम ईमान वाले हो“।}[आले इमरानः 175].

और इस आयते करीमा में अकेले अल्लाह तआला से डरने की अनिवार्यता है, और इस बात की ताकीद है कि यह ईमान के लिये आवश्यक है,तो जिस क़दर बंदे का ईमान होगा उसी क़दर वह अल्लाह तआला से डरेगा।

और मोमिनों की माँ आयशा रजि़अल्लाहु अन्हा से रिवायत है,कहती हैंः «मैंने नबी से इस आयत के विषय में पूछाः {और जो लोग देते हैं,जो कुछ देते हैं और उन के दिल काँपते हैं“।}
[अल मूमिनूनः 18] क्या ये वह लोग हैं जो शराब पीते हैं और चोरी करते हैं?! फरमायाः नहीं ऐ सिद्दीक़ की बेटी,परन्तु ये वह लोग हैं जो रोज़ा रखते हैं, नमाज़ पढ़ते हैं,सदक़ा देते हैं और वह इस बात को लेकर भयभीत रहते हैं कि कहीं इन की ये इबातदतें क़बूल न की जायें।» (त्रिमिज़ी),

अल्लाह तआला से डरने के कारण (असबाब)ः

1- सर्वशक्तिमान अल्लाह की इज़्ज़त और उस का सम्मान करना,क्यांेकि उन्हंे अल्ला तआला,उस के नामों और उस की विशेषताआंे का ज्ञान है। {अपने रब से जो उन के ऊपर है कपकपाते रहते हैं“।}[अन्नहलः 50].

2- इस बात से डरना कि कहीं उन का ठिकाना उस चीज़ की ओर न बने जिसे यह अप्रिय रखते हैं,जैसे नर्क का दुखदाई अज़ाब जो बुरा ठिकाना है।

3- उन वाजिबात को लेकर कोताही का एहसास करना जो उस के ऊपर हैं, इस बात को जानते हुये कि अल्लाह तआला सब कुछ जानता है,देखता है और उस पर शक्ति रखता है,गुनाह को इस निगाह से न देखंे कि वह छोटा है बल्कि इस निगाह से देखें कि वह कितना महान है जिस की नाफरमानी की जारही है।

4- अल्लाह तआला के उस कलाम में विचार करना जो वईद और धमकी से भरा हुआ है उस व्यक्ति के लिये जो अल्लाह की नाफरमानी करे, और उस की शरीअत से मुँह मोड़े,और उस रोशनी को छोड़ दे जिसे उस की ओर भेजा गया ।

5- अल्लाह तआला और उस के रसूल के कलाम में विचार करना और उस के रसूल की सीरत में ग़ौरो फिक्र करना।

6- अल्लाह तआला की महानता में विचार करना,क्यांेकि जो उस में विचार करेगा उसे अल्लाह तआला की विशेषताओं और उस की बड़ाई का ज्ञान होगा,और जिस का दिल अल्लाह तआला की महानता की गवाही देगा उसे अल्लाह तआला से डरने का एहसास हो जायेगा और निःसंदेह वह अल्लाह तआला से भयभीत रहेगा, अल्लाह तआला ने फरमायाः {और अल्लाह तआला अपने आप से डरा रहा है“।}
[आले इमरानः 28].

और अल्लाह तआला ने फरमायाः {और उन लोगों ने जैसा सम्मान अल्लाह का करना चाहिये था नहीं किया,सारी धरती क़यामत के दिन उस की मुðी में होगी और सारा आकाश उस के दायें हाथ में लपेटे हुये होंगे“।}[अज़्ज़ुमरः 67].

अल्लाह तआला से डरना उस के विषय में ज्ञान को अनिवार्य है,और उस के विषय में ज्ञान का होना उस से डरने को अनिवार्य (लाजि़म) है और उस से डरना उस की फरमाँबरदारी को लाजि़म है।

7- मौत और उस की सखती के विषय में विचार करना और इस बात का ज्ञान होना कि इस से किसी को छुटकारा नहीं हैः {कह दीजिये कि जिस मौत से तुम भाग रहे हो वह तो तुम तक ज़रूर पहुँचेगी“।}[अल जुमाः8].तो यह अल्लाह तआला से डर को वाजिब करता है,नबी ने फरमायाः «लज़्ज़तों को चूर चूर करने वाली चीज़(मौत) को अधिकतर याद करो,क्यांेकि किसी ने जीवन की तंगी में इसे याद नहीं किया मगर वह उस पर कुशादा हो गई,और जिस ने कुशादागी में याद किया उस पर तंग होगई» (तबरानी).

8- मरने के बाद,क़ब्र अथवा उस की हौलनाकी के विषय मंे विचार करना,नबी ने फरमायाः «मैंने तुम्हें क़ब्रों की ज़्यारत से रोका था तुम उस की ज़्यारत करो क्यांेकि ये तुम्हें दुनिया से बे रग़बत करती है और आखिरत की याद दिलाती है»
(इब्ने माजा),

और हज़्रत बुरा से रिवायत है,कहते हैंः «हम रसूलुल्लाह के साथ एक जनाज़े में थे,आप एक क़ब्र के किनारे बैठे,और आप रोने लगे यहाँ तक कि मिट्टी गीली हो गई,फिर फरमायाः ऐ मेरे भाइयो इस जैसी चीज़ के लिये तय्यारी कर लो» (इब्ने माजा),

और अल्लाह तआला ने फरमायाः {ऐ लोगो अपने रब का भय रखो और उस दिन का भय रखो जिस दिन पिता अपने पुन्न को कोई लाभ न पहँुचा सकेगा और न पुन्न अपने पिता को तनिक भी लाभ पहुँचाने वाला होगा,याद रखो अल्लाह का वादा सच्चा है,देखो तुम्हें सँासारिक जीवन धोके में न डाले और न धोकेबाज़ तुम्हें धोके में डाल दे“।}[लुक़मानः 33].

9- छोटे छोटे गुनाहों के अंजाम के विषय में विचार करना जिसे लोग हक़ीर समझते हैं,जब कि नबी ने उस की मिसाल एक ऐसे क़ौम से दी है जिन्हों ने एक घाटी में पड़ाव डाला,उस के बाद एक व्यक्ति इस लकड़ी को ढूँड लाया और दूसरा दूसरी लकड़ी ले आया यहाँ तक कि उन के पास इतनी लकड़ी हो गई जिस से वे अपनी रोटी पका लें,और यहाँ पर लकडि़यों और आग जलाने और गुनाहों और उन चीज़ों के बीच सह-संबंध है जो गुनहगारों के चमड़ों के जलने का कारण बनेंगीः {जब उन की खालें (चर्म) पक जायेंगी“।}[अन्निसाः 56].

10- बंदे को यह जान लेना चाहिये कि उस के और उस की तोबा के बीच अचानक मौत आड़ बन सकती है,और उस समय अफसोस से कोई लाभ न होगा, अल्लाह तआला ने फरमायाः {यहाँ तक कि जब उन में से किसी की मौत आने लगती है तो कहता है कि हे मेरे रब मुझे वापस लौटा दे“।}[अल मूमिनूनः 99].

और अल्लाह तआला ने फरमायाः {और तू उन्हें इस दुख और मायूसी के दिन का डर सुना दे“।}[मरयमः 39].

11- बुरे अंत के बारे में विचार करना, अल्लाह तआला ने फरमायाः {फरिश्ते उन के मुंह और कमर पर मार मारते हैं।}[अल अनफालः 50].

12- ऐसे लोगों के साथ बैठो जो तुम्हारे अन्दर अल्लाह का डर और खौफ बिठा दें, अल्लाह तआला ने फरमायाः {और अपने आप को उन्हीं के साथ रखा करें जो अपने रब को सुबह और शाम पुकारते हैं और उसी के मुंह की चाहना करते हैं“।}
[अल कहफः 28].

अल्लाह तआला से डरना ये दो चीज़ों से संबंधित हैः

क- उस के अज़ाब से डरनाः

अर्थात जिन्हें उस के साथ शिर्क करने,उस की नाफरमानी करने और उस से डरने और फरमाँबरदारी से दूर हो जाने पर अज़ाब की धमकी दी है।

ख- अल्लाह तआला से डरनाः

अर्थात ज्ञानियों और अल्लाह को पहचानने वालों का डरः {और अल्लाह तआला अपने आप से डरा रहा है“।}[आले इमरानः 28].

और जब जब अल्लाह तआला का ज्ञान बढ़ेगा,उस का डर भी अधिक होगा,अल्लाह तआला ने फरमायाः {अल्लाह से उस के वही बंदे डरते हैं जो जानकार हैं“।}[फातिरः 28].

क्यांेकि जब वे अपने को और उस के नामों अथवा विशेषताओं को अच्छी तरह जान लेंगे तो वे डर को तरजीह देगें अर्थात प्रभाव दिल पर होगा फिर उस का प्रभाव अंगों पर भी ज़ाहिर होगा।

जब डर दिलों में बस जायेगा तो दिल से उस की इच्छाओं को जला देगा और उस से दुनिया को दूर कर देगा।

अल्लाह तआला से डरने के फलः

क- दुनिया मंे

1-यह धरती में सशक्तिकरण और ईमान अथवा आत्मविश्वास के कारणों में से है क्योंकि जब आप को वह चीज़ मिल जायेगी जिस का आप से वादा किया गया है तो भरोसा अधिक बढ़ जायेगा, अल्लाह तआला ने फरमायाः {और काफिरों ने अपने रसूलों से कहा कि हम तुम्हें देश से निकाल देंगे या तुम फिर से हमारे धर्म में लौट आओ,तो उन के रब ने उन की ओर वह्य भेजी कि हम उन ज़ालिमों का ही नाश कर देंगे,और उस के बाद हम खुद तुम्हें धरती पर बसायेंगे,यह है उन के लिये जो मेरे सामने खड़े होने से डर रखें और मेरी चेतावनी से डरते रहें“}[इब्राहीमः 13-14].

2- नेक अमल और उस में इखलास अथवा दुनिया में उस के बदले कुछ न लेने पर उभारेगा,जिस की वजह से प्रलोक में उस के सवाब में कुछ कमी न होगी,अल्लाह तआला ने फरमायाः {हम तो तुम्हंे केवल अल्लाह की खुशी के लिये खिलाते हैं,तुम से न बदला चाहते हैं और न शुक्रिया,बेशक हम अपने रब से उस दिन का डर रखते हैं जो तंगी और कठोरता वाला होगा“।}[अल इन्सानः 9-10].

और अल्लाह तआला ने फरमायाः {उन घरों में जिन के ऊँचा करने का और वहाँ अपना नाम लिये जाने का अल्लाह ने हुक्म दिया है वहाँ सुबह और शाम अल्लाह की तस्बीह बयान करते हैं,ऐसे लोग जिन्हे तिजारत और खरीदो फरोख्त अल्लाह के जि़क्र से और नमाज़ क़ायम करने और ज़कात अदा करने से ग़ाफिल नहीं करती,उस दिन से डरते हैं जिस दिन बहुत से दिल और बहुत सी आँखें उलट पलट हो जायेंगी“।}
[अन्नूरः 36].

अर्थात वह परेशान होगा और उलटे पलटेगा,यही वह चीज़ है जो उसे अमल के लिये प्ररित करेगी,वे मुक्ति चाहते हैं,हलाक होने से घबराते हैं,और इस बात को लेकर डरे रहते हैं कि कहीं उन का कर्म पन्न (आमाल नामा) उन के बायें हाथ में न दे दिया जाये।

ख- प्रलोक मेंः

जो व्यक्ति अल्लाह तआला से डरेगा उसे अल्लाह का भय हर एक भलाई की ओर मार्ग दिखायेगा।

1- बंदा क़यामत के दिन अल्लाह तआला के अर्श की छाँव में होगा,रसूलुल्लाह ने फरमायाः «और व्यक्ति जिसे हैसियत वाली महिला बुलाये(व्यभिचारकरना चाहे) और वह कहे कि मैं अल्लाह से डरता हूँ..» (बुखारी),

और हदीस का ज़ाहिर ये बताता है कि वह अपनी जु़बान से कहे ताकि महिला अपनी हरकत से बाज़ आ जाये और वह अपने जी में सोचे,और उस पर जमा रहे,और सिद्धांतों की घोषणा के बाद उस से न पलटे,

«और ऐसा व्यक्ति जिस ने अल्लाह तआला का अकेले में याद किया और उस की आँखों से आँसू निकल पड़े..» (बुखारी),

अल्लाह तआला का वह डर जो आँखों को आँसू निकालने पर मजबूर कर दे क़यामत के दिन ऐसी आँख को आग छू भी नहीं सकेगी.

2-यह क्षमा के कारणों में से है,और नबी की हदीस इस पर गवाह हैः

«तुम से पहले एक आदमी था जिसे अल्लाह तआला ने धन दे रखा था,मरते समय उस ने अपने बेटों से कहाः मैं तुम्हारा कैसा बाप था?बेटोें ने कहा अच्छे बाप थे,बाप ने कहा मैं ने कभी अच्छा काम नहीं किया,इस लिये जब मैं मर जाऊँ तो मुझे जला देना और अधिक बारीक कर देना फिर जब आँधी आये तो उस में मुझे उड़ा देना,उन्होंने ऐसा ही किया,फिर अल्लाह तआला ने उसे इकðा किया,पूछा ऐसा करने पर तुझे किस चीज़ ने उभारा,जबाब दिया तेरे डर ने,तो अल्लाह तआला उसे अपनी दया में लेलेगा अर्थात उसे क्षमा कर देगा!!» (बुखारी),

अल्लाह तआला ने उस की जेहालत के कारण उसे विवश (माजू़र) समझा और उस के डर ने उस के रब से सिफारिश की,वरना तो जो व्यक्ति मरने के बाद दोबारा जीवित किये जाने को नहीं स्वीकारता वह काफिर है।

3- डरने वाले को डर स्वर्ग पहुँचाता है क्यांेकि नबी ने फरमायाः

«जो डरेगा वह रात के अंतिम भाग में सफर करेगा,और जो रात के अंतिम भाग में सफर करेगा वह मंजि़ल तक पहुँच जायेगा,सुनो अल्लाह तआला की पूँजी बहुत क़ीमती है, सुनो अल्लाह तआला की पूँजी स्वर्ग बहुत क़ीमती है» (त्रिमिज़ी).

4- क़यामत के दिन शांति,अल्लाहत तआला हदीसे कु़दसी में फरमाता हैः «मेरी इज़्ज़त की क़सम मैं अपने बंदे पर दो डर और दो शांति इकðा नहीं करूँगा,अगर वह मुझ से दुनिया में डरेगा तो मैं उसे क़यामत के दिन शांति दूँगा,और अगर मैं उसे दुनिया में शांति दूँगा तो उसे क़यामत के दिन डराऊँगा» (बैहक़ी)

5- अल्लाह तआला ने अपने इस जैसे कथन में अपने जिन बंदों के गुण बयान किये हैं उस में दाखिल होनाः {बेशक मुसलमान मर्द और मुसलमान औरतें, ईमानदार मर्द और ईमानदार औरतें,इताअत करने वाले मर्द और इताअत करने वाली औरतें,सच्चे मर्द और सच्ची औरतें,सब्र करने वाले मर्द और सब्र करने वाली औरतें,विनती करने वाले मर्द और विनती करने वाली औरतें,दान करने वाले मर्द और दान करने वाली औरतें,रोज़े रखने वाले मर्द और रोज़े रखने वाली औरतें,अपनी शर्मगाह की हिफाज़त करने वाले मर्द और अपनी शर्मगाह की हिफाज़त करने वाली औरतें“।}[अल अहज़ाबः 35].

यह सब अच्छे शब्द हैं जिन्हें प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिये,

अल्लाह तआला ने फरमायाः {उन की करवटें अपने बिस्तरों से अलग रहती हैं,अपने रब को डर और उम्मीद के साथ पुकारते हैं,और जो कुछ हम ने उन्हें दे रखा है वह खर्च करते हैं,कोई पराणी नहीं जानता जो कुछ हम ने उन की आँखों की ठंडक उन के लिये छिपा रखी है,जो कुछ करते थे यह उस का बदला है“।}[अस्सज्दाः 16].

और अल्लाह तआला ने फरमायाः {भला वह इन्सान जो रातों के समय सज्दा और खड़े होने की हालत में इबादत में गुज़ारता हो,आखिरत से डरता हो और अपने रब की रहमत की उम्मीद रखता हो,बताओ तो आलिम और जाहिल क्या बराबर हैं,बेशक नसीहत वही हासिल करते हैं जो अक़लमंद हों“।}[अज़्ज़ुमरः 9].

और अल्लाह तआला ने फरमायाः {और जो अपने रब के अज़ाब से डरते रहते हैं बेशक उन के रब का अज़ाब बेखौफ होने की बात नहीं“।}
[अल मआरिजः 27-28].

और अल्लाह तआला ने अपने क़रीबी बंदो की प्रशंसा की है और वे पैग़म्बर हैं,क्यांेकि वे अल्लाह से डरने वाले हैंः {ये नेक लोग नेक अमल की ओर जल्दी दौड़ते थे,और हमंे चाहत और डर के साथ पुकारते थे“।}[अल अंबियाः 90].

बल्कि फरिश्ते स्वयं अपने रब से डरते हैं,अल्लाह तआला ने फरमायाः {और अपने रब से जो उन के ऊपर है कपकपाते रहते हैं और जो हुक्म मिल जाये उस के पालन करने में लगे रहते हैं“।}[अन्नहलः 50].

6- अल्लाह तआला की प्रसन्नताः {अल्लाह उन से खुश हुआ और ये उस से खुश हुये,यह है उस के लिये जो अपने रब से डरे“।}
[अल बय्यिनाः 8].

अल्लाह तआला का ज्ञान रखने वालों का डर

अल्लाह तआला को पहचानने वाले बंदे अपने अच्छे अमल और अल्लाह तआल से आशा करने के काराण निःसंदेह यही अल्लाह तआला से डरते और अधिक खौफ खाते हैं,उदाहरण के तौर परः

- नबी का नमाज़ की हालत में रोना,आप नमाज़ की हालत में इस प्रकार रोते कि रोने के कारण आप के सीने से हंडी पकने जैसी आवाज आती। (अहमद,अबूदाऊद,नसाई)।

-अबू बक्र अपनी ज़ुबान पकड़ कर कहतेः

«इसी ने मुझे हलाकत में डाला है»

और कहते

«ऐ काश में ऐसा पेड़ होता जिसे खालिया जाता»

उमर बिन खत्ताब कहतेः

«ऐ काश मैं कोई ऐसी चीज़ न होता जिस का जि़क्र किया जाता है,ऐ काश मेरी माँ ने मुझे पैदा ही न किया होता»,

और कहते

«अगर फुरात के किनारे कोई ऊँट मर जाता तो मुझे डर होता कि कहीं अल्लाह तआला क़यामत के दिन उस के बारे में मुझ से सवाल न करे»

और कहते

«अगर आसमान से पुकार लगाने वाला पुकार के कहताः ऐ लोगो तुम सब स्वर्ग में परवेश करने वाले हो सिवाय एक के तो मुझे डर होता कि वह एक मैं ही तो नहीं»!!

- उसमान बिन अफ्फान कहते हैंः

«मैं चाहता हूँ कि मर जाऊँ और दोबारा जीवित न किया जाऊँ»,

आप पूरी रात तस्बीह,नमाज़ और कऱ्ुआन की तिलावत में गुज़ार देते थे।

मुसलमानों की माँ आयशा रजि़अल्लाहु अन्हा अल्लाह तआला का यह कथन पढ़ती थींः {तो अल्लाह ने हम पर बड़ा उपकार किया,और हमें तेज़ गर्म हवाओं के परकोप से बचा लिया“।}[अŸाूरः 27].

अपनी नमाज़ में (पढ़तीं) पस वह अधिक रोती थीं..

{अगर तू इन को सज़ा दे तो यह तेरे बंदे हैं और अगर तू इन्हें माफ करदे तो तू ज़बरदस्त हिक्मत वाला है“।}[अल माइदाः 118].

डर के अह्काम और उस विषय में चेतावनीः

1- खशिय्या शब्द खौफ शब्द से खास है,खशिय्या का अर्थ जो अल्लाह तआला को पहचानते हुये डरेः {अल्लाह से उस के वही बंदे डरते हैं जो जानकार हैं,बेशक अल्लाह तआला ग़ालिब,और बड़ा माफ करने वाला है“।}[फातिरः 28].

डर जो ज्ञान के साथ मिला हुआ हो,नबी ने फरमायाः «अल्लाह की क़सम मैं तुम सब से अधिक परहेज़गार और अल्लाह से डरने वाला हूँ» (मुस्लिम),

और अल्लाह तआला,उस के नामों,उस की विशेषताओं,उस के कमाल और उस की महिमा के विषय में जानकारी के बक़द्र अल्लाह का डर और उस का खौफ होगा।

2- डर उस समय लाभदायक होगा जब वह मेहनत,अमल,और अफसोस अथवा गुनाहों के न करने के इरादे के साथ तोबा करने पर उभारे,तो डर अपराध की कुरूपता के ज्ञान और चेतावनी (वईद) के अनुसमर्थन और अल्लाह के ज्ञान से पैदा होता है जो बड़ा,महान और सर्वशक्तिमान है,और इस प्रकार अल्लाह का डर की कल्पना नहीं की जा सकती जो अमल,मेहनत और तोबा की ओर न बुलाये।

3- अल्लाह तआला से डरना यह वाजिबात में से एक वाजिब है,और यही ईमान का तक़ाज़ा भी है,और यह बेहतर मार्ग और दिल के लिये लाभदायक है,अथवा ये हर इन्सान के लिये अनिवार्य है,और गुनाहों,दुनियादारी,बुरी संगत,अचेतना और एहसासे कमतरी से बचाता है।

”अल्लाह से उस के वही बंदे डरते हैं जो जानकार हैं,बेशक अल्लाह तआला ग़ालिब,और बड़ा माफ करने वाला है“। {फातिरः 28}. जो अल्ल्लाह से डरेगा उसे कोई चीज़ नुक़सान नहीं पहुँचा सकती,और जो अल्लाह के अतिरिक्त से डरेगा उसे कोई चीज़ लाभ नहीं पहुँचा सकती।

अल फुजे़ल बिन अयाज