रब का अर्थ1

रब का अर्थ1

1- रब का अर्थः

रबः अर्थात ऐसा आक़ा जिस की कोई मिसाल नहीं,और ऐसा सुधारक जिस ने अपनी मखलूक़ को आदेश दिया क्योंकि उन्हें अनेक प्रकार की नेमतें दी हैं,और ऐसा मालिक जो पैदा करता और हुक्म देता है, और मखलूक को रब नहीं कहा जा सकता मगर किसी की ओर निस्बत करने की सूरत में,जैसे घर का रब, माल का रब अर्थात मालिक, और बिना किसी चीज़ की ओर निस्बत किये केवल रब अल्लाह ही के लिये खास है.

और जब लोगों को इस बात का ज्ञान है कि उन्हंे अपने रब की आवश्यक्ता है, और वे उस के मुहताज हैं,इस बात के जानने से पहले कि उन्हें उस माबूदे हक़ीक़ी की आवश्यक्ता है और वे उस के मुहताज हैं, और वे अपनी बाद में आने वाली आवश्यक्ता से पहले फौरी आवश्यक्ता के लिये उस का इरादा करते हैं, तो यह अनिवार्य हुआ कि वे अल्लाह की उलूहियत,उस की प्रार्थना करने, उसकी सहायता माँमगने, और उस पर भरोसा करने अर्थात अधिकतर उस की इबादत करने और उस की ओर लौटने से पहले अल्लाह की रुबूबियत का इक़रार करें।

और रब और रुबीबियत महान अर्थांे को समेटे हुये हैं जैसे तसर्रुफ,जीविका,स्वास्थ,तौफीक़ मार्गदर्शिका,अल्लाह तआला फरमाता हैः {वही है जो मुझे खिलाता पिलाता है,तथा जब मैं रोगी हो जाऊँ तो मुझे निरोग (शिफा) अता करता है,और वही मुझे मार डालेगा,फिर जि़न्दा करदेगा“।}[अश्शोराः 79-81].


2- रब के वजूद पर प्रमाणः

पूरा संसार अल्लाह तआला के वजूद का इक़्रार करता है,तस्दीक़ करता है,स्वीकारता है,ईमान लाता है और कहता है,अल्लाह तआला ने फरमायाः {उन के रसूलों ने उन से कहा कि क्या अल्लाह (जो सच है) उस के बारे में शक है जो आकाशों और धरती का पैदा करने वाला है वह तो तुम्हें इस लिये बुला रहा है ताकि वह तुम्हारे सारे गुनाह माफ करदे और एक मुक़र्रर वक़्त तक तुम्हंे मौक़ा अता करे,उन्हों ने कहा कि तुम तो हम जैसे ही इन्सान हो तुम चाहते हो कि हम को उन देवताओं की पूजा से रोक दो जिन की पूजा हमारे बुज़र्ग करते रहे,अच्छा तो हमारे सामने कोई वाज़ेह दलील पेश करो“।}[इब्राहीमः 10].

मोमिनः वह है जो इस बात पर यक़ीन करे कि अल्लाह तआला ही रब है जो हर चीज़ की शक्ति रखता है अर्थात इस पर विश्वास रखता है कि वही अकेला उपासक है। आप अल्लाह तआला की प्रशंसा कदापि नहीं कर सकते मगर उस के कृपादया और उस के इनाम से, और दोनों हालतों में आप अल्लाह तआला के मुहताज हैं.

और उस पर किस प्रकार प्रमाण माँगा जाये जो अल्लाह तआला स्वयं हर चीज़ की दलील है.

और अगर हम इस ओर तवज्जोह न दें,और रब के मौजूद होने के प्रमाण ढूँडें तो निम्न लिखित प्रमाण हमें मिलते हैंः

प्रकृति (फित्रत) की दलील

पैदा करने वाले के ऊपर ईमान, इसी पर सृष्टि की रचना हुयी है,तो इस फित्रत से कोई हट नहीं सकता मगर जिस के दिल और दिमाग़ से अल्लाह तआला इसे मिटा दे. और इस बात का सब से महान प्रमाण की फित्रत अल्लाह के वजूद पर दलालत करती है नबी का यह फरमान हैः «हर बच्चा फित्रत अर्थात फित्रते इस्लाम पर पैदा होता है,परन्तु उस के माँ बाप उसे यहूदी,इसाई,और मजूसी बना देते हैं,जैसे जानवर ठीक ठाक जानवर को जन्म देता है क्या तुम उस में कुछ कान या नाक कटा देखते हो?» (बुखारी).

और हर एक मखलूक अपनी फित्रत के कारण तौहीद को स्वीकारती है, अल्लाह तआला ने फरमायाः {तो आप एकग्र(एकसू) हो कर अपना मुँह दीन की ओर केन्द्रित कर दें,अल्लाह तआला की वह फित्रत जिस पर उस ने लोगों को पैदा किया है,अल्लाह तआला के बनाये को बदलना नहीं,यही सच्चा दीन है,लेकिन अधिकतर लोग नहीं समझते“।}[अर्रूमः 30].

तो अल्लाह तआला के वजूद पर यह फित्रत की दलील है.

और अल्लाह तआला के वजूद पर फित्रत की दलील सब से महान दलील है उस व्यक्ति के लिये जिसे शैतान ने नहीं भटकाया,इसी लिये अल्लाह तआला ने फरमायाः {अल्लाह तआला की वह फित्रत जिस पर उस ने लोगों को पैदा किया है“।}[अर्रूमः 30].

अपने इस फरमान के बाद {तो आप एकग्र(एकसू) हो कर अपना मुँह दीन की ओर केन्द्रित कर दें“।}[अर्रूमः 30].

सही फित्रत अल्लाह के वजूद की गवाही देती है,और जिसे शैतान घुमा फिरा कर गुमराह करदे हो सकता है उसे यह दलील रोक दे और उसे रब की ज़रूरत महसूस होे,और जब बंदा बड़ी मुसीबत में पड़ जाता है तो उस के दोनों हाथ,उस की दोनों आँखें और उस का दिल आकाश की ओर मुतवज्जेह होता है और वह अपनी फित्रत और अपनी ठीक ठाक पैदाइश के कारण तुरंत अपने रब से मदद और सहायता माँगता है.

अल्लाह ...यह ऐसा नाम है जो फित्रत में रचा बसा है इस लिये किसी स्पष्ट दलील की कोई आवश्यक्ता नहीं.

अक़्ली दलीलः

अल्लाह तआला के वजूद पर सब से महान और स्पष्ट दलीलें अक़्ली दलीलें हैं जिस का इन्कार हटधर्म के अतिरिक्त कोई नहीं करेगा और वह दलीलें यह हैः

1- हर मखलूक़ का कोई खालिक़ (पैदा करने वाला) है क्यांेकि इस में कुछ लोग ऐसे हैं जौ पहले आये और कुछ ऐसे हैं जो बाद में,(जिस से पता चला कि)ज़रूर इन का कोई न कोई पैदा करने वाला है जिस ने इन्हें अदम से वजूद बखशा,क्योंकि कोई चीज़ खुद नहीं आ सकती और न ही अचानक प्रकट हो सकती है,इस लिये कि कोई चीज़ अपने आप को वजूद नहीं दे सकती क्योंकि कोई चीज़ अपने आप को पैदा ही नहीं कर सकती इस लिये कि वह अपने वजूद से पहले अदम अर्थात न है तो वह पैदा करने वाला कैसे हो सकता है?!क्यांेकि हर आने वाली चीज़ को कोई लाने वाला होना चाहिये,इस लिये कि इस का वजूद इस ईजाद करने वाले के नेज़ाम,सामांजस्य स्थिरता पर अथवा कारण और कारण बनाने वाले एवं संसार के बीच जुड़ा हुआ लिंक है जिस से पता चलता है कि इन का एक दूसरे से लगाव है,जिस से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह अचानक वजूद में नहीं आये हैं,हर मखलूक़ का एक खालिक़ है,और जब यह बात स्पष्ट हो गई कि यह मखलूक़ात न अपना वजूद बना सकती हैं और न ही यह अचानक वजूद में आ सकती हैं तो यह मुतय्यन हो गया कि इन का कोई पैदा करने वाला है और वह अल्लाह तआला ही है जो सारे जहानों का रब है,और अल्लाह तआला ने इस मानसिक और स्पष्ट सबूत को बयान किया है,फरमायाः {क्या ये बिना किसी पैदा करने वाले के खुद ही पैदा हो गये हैं या ये खुद पैदा करने वाले हैं“।}[अत्तूरः 35].

अर्थात वह बिना पैदा करने वाले के पैदा नहीं किये गये और न ही उन्हांेने अपने आप को पैदा किया तो मुतय्यन हो गया कि उन का पैदा करने वाला अल्लाह तआला ही है,इसी लिये जब जुबेर बिन मुत्इम ने रसूलुल्लाह को सूरे तूर पढ़ते हुये सुना और इस आयत पर पहुँचेः {क्या ये बिना किसी पैदा करने वाले के खुद ही पैदा हो गये हैं,या ये खुद पैदा करने वाले हैं,क्या उन्होंने ही आसमानों और ज़मीनों को पैदा किया है? बल्कि यह यक़ीन न करने वाले लोग हैं,या इन के पास तेरे रब के खज़ाने हैं?या(उन खज़ानों के) ये रक्षक हैं“।}[अत्तूरः 35-37].

और जुबेर उस समय मुश्रिक थे,उन्होंने कहाः «क़रीब था कि मेरा दिल उड़ने लगे।» (बुखारी).

2- अल्लाह तआला की ज़ाहिरी निशानियाँ उस के संसार और उस की मखलूक़ में, अल्लाह तआला ने फरमायाःः {आप कह दीजिये कि तुम खयाल करो कि क्या-क्या चीज़ें आकाशांे और धरती में हैं“।}[यूनुसः 101].

इस लिये कि आकाशों और धरती में विचार करना इस बात को बयान करता है कि अल्लाह तआला ही पैदा करने वाला है, अथवा यह स्पष्ट होता है कि अल्लाह तआला ही रब है.एक दिहात के रहने वाले दिहाती से पूछा गयाः तुम ने किस प्रकार अपने रब को पहचाना? उस ने कहाः प्रभाव मार्च का और मेंगनी ऊँट के वजूद का प्रमाण है,और बुर्जाें वाले आकाश,और गलियों वाली धरती और ठाठें मारता समुद्र क्या सुनने वाले और देखने वाले (अल्लाह) के वजूद पर प्रमाण नहीं हैं ?

पूरी इंसानियत गैब के परदों के सामने आजिज़ और अपूर्ण है अगरचे उन का अवर विज्ञान,ज़मीनी और भौतिकवादी ज्ञान कितना अधिक ही क्यों न हो जाये,और केवल अल्लाह तआला पर ईमान इस विवश को समाप्त करने के लिये काफी है

3-दुनियावी मामलों का इन्तेज़ाम और उस की मज़बूती,यह इस बात का प्रमाण है कि इसे चलाने वाला एक उपासक,एक बादशाह,और एक रब है,उस के अतिरिक्त सृष्टि का कोई रब नहीं है,और न ही उस के सिवा कोई उन का रब है,और जिस प्रकार दो पैदा करने वाले रब का वजूद जो दुनिया के लिये एक समान हो असम्भव है, इसी प्रकार दो माबूदांे और दो उपासकों का पाया जाना असम्भव है,तो इस बात का ज्ञान कि संसार में दो एक जैसे बनाने वालों का पाया जाना असम्भव है, और यह फित्रत में रचा बसा हुआ है,और मानसिक तौर पर भी इस का व्यर्थ होना वाज़ेह है,तो इसी प्रकार दो उपासकों का पाया जाना भी असम्भव है।

शास्न्नानुसार प्रमाण (शरई दलील)

स्ंपूर्ण शरीअतें पैदा करने वाले के वजूद और उस के ज्ञान की पूर्णता और उस की हिक्मत और दया पर प्रमाण हैं,क्यांेकि ज़रूरी है कि इन शरीअतों का कोई बनाने वाला हो, और शरीअत बनाने वाला अल्लाह तआला ही है,अल्लाह तआला ने फरमायाः {हे लोगो! अपने उस पालनहार की इबादत करो जिस ने तुम को और तुम से पहले के लोगों को पैदा किया ताकि तुम परहेज़गार हो जाओ,जिस ने तुम्हारे लिये धरती को बिछौना और आकाश को छत बनाया, और आकाश से वर्षा की और उस से फल पैदा करके तुम्हें जीविका दी,अतः ये जानते हुये किसी को अल्लाह का शरीक न बनाओ“।}[अल बक़राः 20-21].

और संपूर्ण आसमानी किताबें इस की गवाही दे रही हैं.

हिस्सी दलीलः

अल्लाह तआला के वजूद पर वाज़ेह और स्पष्ट दलीलों में से अनुभवशक्ति (हिस्स) की दलील है जो ज़ाहिर है,और जिस का एहसास हर एक देखने वाला और ज्ञानचछु(बसीरत)वाला व्यक्ति कर सकता है,और उन में सेः

1- दुआओं का क़बूल करना हैः इन्सान अल्लाह तआला से दुआ करते हुये कहता हैः हे रब! और किसी चीज़ को मागँता है फिर उस की दुआ क़बूल की जाती है,और रब के वजूद पर यह हिस्सी दलील है,उस ने अल्लाह को पुकारा और अल्लाह तआला ने उस की दुआ क़बूल की,और उस ने यह चीज़ अपनी आँखों से देखी,इसी प्रकार हमारे सामने पहले और आज भी अधिक नमूने है जिस के बारे में हम सुनते हैं कि अल्लाह तआला ने उन की पुकार सुन ली,और यह वास्तविकता है जो पैदा करने वाले के वजूद पर हिस्सी प्रमाण है और इस प्रकार की अनेक मिसालें कु़रआन में मौजूद हैं,उस में से यह है अर्थात अय्यूब अलैहिस्सलाम की मिसालः {और अय्यूब (की उस हालत को याद करो) जब कि उस ने अपने रब को पुकारा कि मुझे यह रोग लग गया है,और तू सब रहम करने वालों से अधिक रहम करने वाला है तो हम ने उस की (गुहार) सुन ली“।}[अलअंबियाः 83-84].

और इस के अतिरिक्त अधिकतर आयतें हैं.

2- मखलूक़ का मार्गदर्शन उन चीज़ों की ओर जिन में उन के जीवन का राज़ है,कौन है वह ज़ात जिस ने बच्चे को पैदाइश के समय उस की माँ की छाती से दूध पीने की रहनुमाई की? और किस ने ज़मीन के नीचे हुदहुद चिडि़या को ज़मीन के भीतर पानी पाये जाने की जगहें दिखाईं जब कि उस के सिवा कोई और न देख सका?! निःसंदेह वह अल्लाह है जिस ने कहा किः {हमारा रब वह है जिस ने हर एक को उस का खास रूप अता किया,फिर हिदायत भी दिया“।}[ताहाः 50].

इल्हाद(नास्तिकता) मानसिक रोग और विचार का दोष है. इल्हाद(नास्तिकता) मानसिक रोग,विचार का दोष, दिल का अन्धकार (तारीकी) और जीवन की बरबादी है.

3- वह निशानियाँ जो अंबिया और रसूलों को दे कर भेजी गईंः अर्थाता वह मोजज़ात जिन के ज़रिये अल्लाह तआला ने अपने नबियों और रसूलों की मदद की और उन्हें दूसरे मनुष्यांे के बीच चुना,हर नबी को अल्लाह तआला ने उस की क़ौम की ओर ऐसा मोजज़ा दिया जो इस बात को साबित करती थी कि जिन चीज़ों को देकर नबी भेजे गये एक उपासक, एक पैदा करने वाले की ओर से भेजे गये हैं जिस के अतिरिक्त कोई पालनहार नहीं और न ही उस के सिवा कोई सत्य उपासक.


3- एकेश्वरवादी व्यक्ति पर तौहीदे रुबूबियत का प्रभावः

1- हैरानी और शक से मुक्तिः वह व्यक्ति कैसे हैरानो परेशान और शक में पड़ सकता है जो यह जानता हो कि उस का एक पालनहार है, और वही सभांे का पालनहार है, उसी ने उस को पैदा किया,उसे सुधारा,उसे सम्मान और प्रतिष्ठा दी, और उसे ज़मीन का खलीफा बनाया,आसमान और ज़मीन की सब चीज़ों को उस के वश में किया और उसे अपनी सब ज़ाहिरी और छिपी नेमतें दीं,अपने रब से वह संतुष्ट (मुतमइन) हुआ और उस की पनाह में आया,और यह समझ गया कि जीवन छोटा है जिस में अच्छाई बुराई के साथ,न्याय ज़ुल्म के साथ और स्वाद दर्द के साथ मिश्रित है.

और वह लोग जो अल्लाह तआला को रब नहीं मानते उस की मुलाक़ात को लेकर शक में पड़े हुये है उन का जीवन व्यर्थ है जिस में कोई आनंद नहीं,सारा जीवन परेशानी,हैरानी और लगातार ऐसे सवालों में घिरा हुआ है जिस का कोई जवाब नहीं,उन का कोई सहारा नहीं जिस की ओर वह पनाह ढूँडें,उन की बुद्विमŸाा कितनी अधिक क्यों न हो फिर भी उन की बुद्वियाँ हैरानी,संदेह,परेशानी और चिंता में हैं,और यही दुनियावी अज़ाब और जहन्नम है जो सुबह शाम उन के दिलों को झुलसा रहे हैं।

2- मानसिक शांतिः शांति का केवल एक स्थान है और वह अल्लाह और प्रलोक पर ईमान लाना है... ऐसा सच्चा ईमान जिसे संदेह और नेफाक़ (कपटाचारी) खराब और बरबाद न कर सकें,यही वास्तविकता है और तारीख भी इस की गवाह है, अथवा हर देखने वाला और अपने अथवा दूसरों के साथ न्याय करने वाला व्यक्ति इसे महसूस करता है, हमें इस बात का ज्ञान हो गया कि अधिकतर चिंतित,परेशान और तंग अथवा बेवकूफी और बरबादी के एहसास में मुब्तला लोग ही ईमान और यक़ीन की निधि (नेमत) से महरूम हैं उन के जीवन में न तो कोई आनंद है और न ही कोई मज़ा अगरचे उन का जीवन लज़्ज़तों और आराम देने वाली चीज़ों से भरा पड़ा है क्यांेकि वह इस के अर्थ को न जान सकते हैं और न ही उस के मक्सद को पहचान सकते हैं, और न ही जीवन के भेद को जान सकते हैं,जब बात यह है तो किस प्रकार उन के नफ्स को शांति और उन के सीने को सुकून मिल सकता है?! निःसंदेह यह शांति ईमान का फल है और तौहीद एक पविन्न पेड़ है जिस का फल अल्लाह की आज्ञंा से हर समय खाया जाता है,यह आसमानी

ठंडी हवा है जिसे अल्लाह तआला मोंमिनों के दिलों पर भेजता है ताकि जब लोगों के क़दम डगमगाने लगें तो वह जम जायें और जब लोग नाराज़ हों तो ये प्रसन्न रहें और जब लोग संदेह में पडे़ हों तो इन्हें यक़ीन हो और जब लोग वावेला करें तो यह धैर्य रखें और जब लोग गुमराह होने लगें तो ये सब्र के साथ जमे रहें.यही वह शांति है जिस ने हिज्रत के दिन नबी के दिल को ढारस दी थी, जिस की वजह से न तो आप चिंतित हुये और न ही दुखी,न तो आप डरे और न ही भयभीत हुये,न आप के सीने मंे संदेह आया और न ही चिंता, अल्लाह तआला ने फरमायाः {अगर तुम उस (रसूल मुहम्मद) की मदद न करो तो अल्लाह ही ने उस की मदद की उस समय जब काफिरों ने उसे (देश से) निकाल दिया था,दो में से दूसरा जब कि वह दोनों गुफा में थे,जब ये अपने साथी से कह रहे थे कि फिक्र न करो अल्लाह हमारे साथ है“।}[अत्तोबाः 40].

आप के मिन्न अबूबक्र सिद्दीक़ पर ग़म और डर के बादल छागये लेकिन यह डर अपनी ज़ात के लिये नहीं था बल्कि नबी और तौहीद की दावत के लिये था,यहाँ तक कि सिद्दीक़ ने जब दुश्मनांे को देखा कि वह गार को घेरे हुये हैं तो कहाः «ऐ अल्लाह के रसूल! अगर इन में से किसी ने भी अपना पाँव देखा अर्थात सर झुकाया तो वे हमें अपने क़दमों के नीचे देख लेगा,तो आप ने उन के दिल को सुकून पहँुचाने के लिये फरमायाः ऐ अबू बक्र तुम्हारा उन दो के बारे में क्या खयाल है जिन का तीसरा अल्लाह हो?!» (मुस्लिम),

और यह शांति अल्लाह की रूह है और ऐसा नूर है जिस की ओर आने से डरने वाले को आराम चिंतित को सुकून, दुखी को तसल्ली,थके हारे को विश्राम,कमज़ोर को शक्ति और असमंजस को हिदायत मिलती है.यह जन्नत की खिड़की है जिसे अल्लाह तआला अपने मोमिन बंदों पर खोलता है,उस से उस के लिये ठंडी ठंडी हवायें आती हैं और उस की चमक उन पर पड़ती है, और उस से महक और इन्न की खुशबू फूटती है,ताकि जो अच्छाई उन्होंने पहले भेजी है उस के बदले उन्हें कुछ आनंद चखाये,और जिन नेमतों का वह इन्तेज़ार कर रहे हैं उस का छोटा सा नमूना दिखाये,तो यह रूहें सुख, अनेक प्रकार के खाने अथवा सुरक्षा और शांति के मज़े लेंगे।

3- अल्लाह पर भरोसा करनाः हर एक चीज़ अल्लाह के हाथ में है,और उसी में सेः लाभ और हानि भी है,अल्लाह तआला ही पैदा करने

वाला है,वही जीविका देने वाला,मालिक और इंतेज़ाम संभालने वाला है, आकाशांे ओर धरती की कुंजियों का मालिक वही है, इस लिये कि जब मोमिन को इस बात का ज्ञान होगा कि उसे कोई भलाई,बुराई लाभ और हानि नहीं पहुँच सकती मगर जितना कि अल्लाह तआला ने उस के भाग में लिख दिया है,और जो कुछ अल्लाह ने लिख दिया है पूरी सृष्टि यदि उस के खेलाफ हो जाये तो कुछ नहीं कर सकती,उस समय मोमिन को विश्वास हो जायेगा कि केवल अल्लाह तआला ही अकेला लाभ और हानि का मालिक है,वही देने वाला भी है और रोकने वाला भी,और यह चीज़ हमें अधिक अल्लाह तआला पर भरोसा करने और तौहीद की महानता को स्वीकारने को अनिवार्य करती है,यही कारण है कि अल्लाह तआला उस बंदे की बुराई बयान करता है जो ऐसी चीज़ों की इबातदत करता है कि वे न तो उसे लाभ पहुँचा सकती हैं और न ही हानि और नही इबादत करने वाले के किसी काम आ सकती हैं,बरकत वाली है वह हस्ती जिस ने यह कहाः {आकाशांे ओर धरती की कुंजियों का मालिक वही है,और जिन जिन लोगों ने अल्लाह की आयतों का इन्कार किया है वही नुक़सान उठाने वाले हैं“।}[अज़्जुमरः 63].

4- अल्लाह की ताज़ीम करनाः और यह प्रभाव उस व्यक्ति के जीवन में ज़ाहिर है जो अल्लाह तआला पर ईमान लाता है, केवल उसी की इबादत और इरादा करता है, उसी के समीप अपनी भावनाओं को रखता है,और उसी से माँगता है,और जब मोमिन इस बात में विचार करता है कि आसमानों और ज़मीन की बादशाहत उसी के लिये है तो वह यह कहे बिना नहीं रह सकेगाः {मेरा रब हर चीज़ को अपने इल्म के दायरे में घेरे हुये है“।}[अल अन्आमः 80].

और कहेगाः {हे हमारे रब! तू ने यह सब बिना फायदे के नहीं बनाया“।}[आले इमरानः 191].

यह सारी चीज़ें इस बात का प्रमाण हैं कि दिल पैदा करने वाले पालनहार से जुड़ा हुआ है,और वह अल्लाह की प्रसन्ता के लिये मेहनत करता है, और इस बात की कोशिश में रहता है कि अल्लाह के क़ानून और उस के आदेश को सम्मान दे,और उन चीज़ों को अल्लाह का साझी न बनाये जो अपने लिये और दूसरों के लिये आसमान एवं ज़मीन में एक कण के भी मालिक नहीं हैं, और यह सब अल्लाह तआला के सम्मान के लिये है, और यह मोमिन के ऊपर तौहीदे रुबूबियत के प्रभाव का नतीजा है।

ईमान जीवन रक्षक नौका ह जो अल्लाह को काफी समझे लोग खुद उस की ओर झुक जायेंगे जब जब आप का लगाव अल्लाह तआला से कमज़ोर होगा तब तब आप खींच तान और वसवसों का शिकार बनेंगे. दिल की परेशानी अल्लाह तआला की ओर मुतवज्जेह होने से दूर होगी,और उस की घबराहट अकेले में उस के संग तअल्लुक़ जोड़ने से खत्म होगी, और उस का दुख रब को अच्छी तरह से जानने और उस के संग सच्चा सम्बंध जोड़ने से दूर होगा।

4- नास्तिकता (इल्हाद) और उस की खतरनाकी

पैदा करने वाले के वजूद का इन्कार करना नास्तिकता (इल्हाद) कहलाता है,चाहे वह बीमार सोच,बीमार निगाह की वजह से हो, या विमुखता,हठ और केवल जि़द की वजह से हो,यह मानसिक रोग या गलत सोच और दिल के अंधकार का नतीजा है,यह नास्तिक को कमज़ोर निगाह और अन्धकारपूर्ण दिल बनाता है, जिस की वजह से वह केवल महसूस होने वाली साम्रगियांे को देख और पहचान सकता है,फिर वह नास्तिकता वाली सोच और विश्वास को लोगों पर थोपता है,जिस की वजह से वह खुद बदबखत और भटक जाता है और यह विश्वास रखने लगता है कि इन्सान केवल एक तत्व(माद्दा) है जिस पर प्राकृतिक तत्व के का़नून लागू किये जायेंगे,

और मानव के लिये यह खतरा है, इस प्रकार कि(नास्तिकता) उसे केवल एक तत्व और ऐसा सूखा समझदार बना देती है जिस में सुख,चैन और खुशी नाम की कोई चीज़ नहीं रह जाती है,नास्तिक का ईमान रब के वजूद पर नहीं होता, इस लिये वह बिना रब और उस के अज़ाब से डरे जब जो चाहे जैसा चाहे करता है, जो मानव की हलाकत और उस की बरबादी तक ले जाती है,जब कि ऐसा करना अल्लाह तआला का इन्कार और उस का हक़ दूसरों को देने जैसा है,यही कारण है कि नास्तिक विचारकों,ज्ञानियों और नास्कित कवियों ने अधिकतर आत्महत्यायें की हैं, इतिहास इस की गवाह है और तारीख में यह चीज़ें भरी पड़ी हैं अर्थात अध्ययनों से भी यह चीज़ साबित है,और विश्व स्वास्थ्य संगठन (व्ॅभ्) के दो विषेशज्ञांे डाक्टर जोस मैनुएल और शोधकर्ता अलइसंेद्रा फिलिश्मान के अध्ययन में यह बात आई है कि आत्महत्या और धर्म के बीच गहरा सम्बंध है, उन्हों ने कहा कि अधिक आत्महत्या करने वाले नास्तिक ही हैं और इस की व्याख्या इस प्रकार की गई हैः

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उस अल्लाह पर ईमान जिस के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, यह दरजे के एतबार से सब से प्रमुख आमाल,और स्थान के एतबार से सब से श्रेष्ठ है और नसीबे के एतबार से सब से ऊँचा है,

इमाम शाफेइ