Home /उस अल्लाह को पहचानो जिस के अतिरिक्त कोई सत्य उपास्य नहीं / ”लइलाहा इल्लल्लाह“ की प्रतिष्ठाः

”लइलाहा इल्लल्लाह“ की प्रतिष्ठाः


”लइलाहा इल्लल्लाह“ की प्रतिष्ठाः

रसूलुल्लाह ने फरमायाः «इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर हैः इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य उपास्य नहीं और मुहम्मद अल्लाह के पैग़म्बर हैं,और नमाज़ क़ायम करना और ज़कात देना,और हज्ज करना और रमज़ान के रोजे़ रखना» (बुखारी).

और नबी ने फरमायाः «सब से बेहतर बात जो मैंने और मुझ से पहले नबियों ने कही है वह यह है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य उपास्य नहीं,वह अकेला है उस का कोई साझी नहीं,उसी के लिये बादशाहत है और उसी के लिये प्रशंसा है,और वह हर चीज़ पर शक्तिमान है» (त्रिमिज़ी).

और नबी ने फरमायाः «निःसंदेह अल्लाह के नबी नूह न जब मैात की हालत में थे तो अपने बेटे से कहा,मैं तुझे लाइलाहा इल्लल्लाह कहने का आदेश देता हूँ,क्यांेकि सातों आकाश और सातों ज़मीन को यदि एक पलड़े में रख दिया जाये और लाइलाहा इल्लल्लाह को एक पलड़े में रख दिया जाये तो लाइलाहा इल्लल्लाह का पलड़ा भारी पड़ जायेगा,और अगर सातों आकाश और सातों ज़मीन ऐस छल्ले की तरह हों जिन के द्वार या किनारों का पता न चले तो लाइलाह इल्लल्लाह इसे तोड़ देगा»(इमाम बुखारी ने अलअदबूल मुफ्रद में रिवायत किया है).

लइलाहा इल्लल्लाह के कारण अल्लाह तआला ने स्वर्ग को सजाया है,और जहन्नम को भड़काया है,और अच्छाइयों अथवा बुराइयों का बाज़ार क़ायम किया है.

लाइलाहा इल्लल्लाह की शर्तेंः

1- लाइलाहा इल्लल्लाह के अर्थ का ज्ञानः

और वह इस प्रकार कि इस शब्द (कलिमा) को पढ़ने वाला इस के अर्थ और जो उस में अल्लाह के अतिरिक्त से उलूहियत की नफी और अल्लाह तआला के लिये उलूहियत का सबूत है उसे जान ले, अल्लाह तआला ने फरमायाः {तो (हे नबी) आप यक़ीन कर लें कि अल्लाह के सिवा कोई (सच्चा) उपास्य नहीं“।}[मुहम्मदः 19].

2- यक़ीनः

अर्थात इस कलिमा के कहने वाले के दिल में इस कलिमा और जिस अर्थ को यह शामिल है उस विषय में संदेह न हो,अल्लाह तआला के इस फरमान के कारणःsa {ईमान वाले तो वे हैं जो अल्लाह पर और उस के रसूल पर ईमान लायें,फिर शंका संदेह न करें और अपने माल से और अपनी जान से अल्लाह के रास्ते में धर्मयुद्व करते रहें,यही सच्चे हैं“।}[अल हुज्रातः 15].

और नबी ने फरमायाः «मैं इस बात की गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य उपास्य नहीं,और मैं अल्लाह का रसूल हूँ,जब बंदा अल्लाह से इस हाल में मिले कि इन दोनों कलिमों में इसे संदेह न हो तो वह स्वर्ग में प्रवेश करेगा» (मुस्लिम).

3- जिन चीज़ों का यह कलिमा तक़ाज़ा करे उसे दिल और जु़बान से स्वीकारनाः

और यहाँ पर स्वीकारने का अर्थ नकारने और अहंकार का विपरित है, अल्लाह तआला ने फरमायाः {हम पापियों के साथ इसी तरह किया करते हैं,ये वह हैं कि जब उन से कहा जाता है कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं तो यह घमंड करते थे“।}[अस्साफ्फातः 34-35].

4- जिस पर यह कलिमा दलालत करे उस की पैरवी करनाः

अर्थात बंदा अल्लाह के आदेश का पालन करे और जिन चीज़ों से रोका है रुक जाये,अल्लाह तआला ने कहाः {और जो इन्सान अपने चेहरे को अल्लाह के ताबे कर दे और वह है भी परहेज़गार,तो बेशक उस ने मज़बूत कड़ा थाम लिया,सभी अमल का नतीजा अल्लाह की तरफ है“।}[लुक़मानः 22].

निःसंदेह वास्तव में गुलामी दिल की गुलामी और उस की बंदगी है तो जिस ने दिल को अपना गुलाम बना लिया तो दिल उस का गुलाम होगा।

5- सच्चाईः

इस का अर्थ यह है जो इस कलिमा का इक़रार करे वह दिल से उस की पुष्टि(तस्दीक़) करे अर्थात जो जु़बान पर है वही दिल में भी हो, अल्लाह तआला ने फरमायाः {और लोगों में से कुछ कहते हैं,हम अल्लाह पर और आखिरी दिन पर ईमान लाये हैं,लेकिन हक़ीक़त में वे ईमान वाले नहीं हैं,वह अल्लाह को और ईमान लाने वालों को धोका दे रहे हैं,और उन को समझ नहीं है“।}[अल बक़राः 8-9].

6- इख्लास

अर्थात इस कलिमा से अल्लाह के चेहरे का इरादा करे, अल्लाह तआला ने फरमायाः {उन्हें इस के सिवाय कोई हुक्म नहीं दिया गया कि केवल अल्लाह की इबादत करें उसी के लिये धर्म को शुद्व कर रखंे एकेश्वरवादी के धर्म पर, और नमाज़ को क़ायम रखें और ज़कात देते रहें,और यही धर्म सीधी मिल्लत का है“।}[अल बय्यिनाः 5].

7- इस कलिमा, और इस कलिमा पर अमल करने वाले, और इस की शर्तों की पाबंदी करने वालों से प्रेम करना और जो इस कलिमा को तोड़ने (इन्कार करने ) वाले हैं उन से नफरत करना, अल्लाह तआला ने फरमायाः {और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह के साझीदार दूसरों को ठहराकर उन से ऐसा प्रेम रखते हैं जैसा प्रेम अल्लाह से होना चाहिये और ईमान वाले अल्लाह से प्रेम में सख्त होते हैं“}[अल बक़राः 165].

जब जब दिल मंे अल्लाह तआला की मुहब्बत अधिक होगी उस की उबूदियत बढे़गी और वह अल्लाह के अतिरिक्त से अधिक आज़ाद हो जायेगा।

यह ”लाइलाहा इल्लल्लाह“ का अर्थ है और वे (ऊपर) उस की वह शर्तें है जो अल्लाह के निकट बंदे की मुक्ति का कारण हैं.हसन बसरी से कहा गयाः कुछ लोग कहते हैंः जिस ने लाइलाहा इल्लल्लाह कहा वह जन्नत में दाखिल होगा,फरमायाः जिस ने लाइलाहा इल्लल्लाह कहा और उस के हक़ और फर्ज़ को निभाया वह जन्नत में दाखिल होगा।

लाइलाहा इल्लल्लाह का इक़रार उस व्यक्ति को लाभ नहीं पहुँचा सकता जो उस पर अमल न करे और न उस की शरतों का पालन करे,जिस ने इस कलिमा का जु़बान से इक़रार किया पर उस की दलालतों पर अमल न किया तो ज़ुबान से लाइलाहा इल्लल्लाह कहना उसे लाभ नहीं पहुँचा सकता यहाँ तक कि कथन के साथ अमल को मिलाये।

”लाइलाहा इल्लल्लाह“ के नवाकि़ज

1- शिर्क,और यहाँ शिर्क से मुरादः

बड़ा शिर्क है जो इस्लाम से बाहर कर देता है,और अगर उसी हालत पर मर गया तो उसे अल्लाह तआला क्षमा नहीं करेगा,और शिर्क कहते हैं अल्लाह तआला की उलूहियत,रुबीबियत और उस के अस्मा व सिफात में किसी को साझी मानना, अल्लाह तआला ने फरमायाः {बेशक अल्लाह अपने साथ शिर्क किये जाने को कभी भी माफ नहीं करेगा और इस के सिवाय को जिस के लिये चाहे माफ कर देगा और जिस ने अल्लाह के साथ शिर्क किया वह बहुत दूर बहक गया “।}[अन्निसाः 116].

किसी व्यक्ति के लिय यह जायज़ नहीं कि वह अल्लाह के अतिरिक्त किसी और को पुकारे और जिस दुआ की इजाज़त दी गई है उस का आदेश भी दिया गया है,और इस का अर्थ अल्लाह तआला के इस कथन से लिया गयाः ”और अच्छे नाम अल्लाह के लिये ही हैं,इस लिये इन नामों से अल्लाह ही को पुकारो,और ऐसे लोगों से संबंध भी न रखो जो उस के नामों में टेढ़ापन करते हैं,उन लोगों को उन के किये की सज़ा ज़रूर मिलेगी“। [अल आराफः 180].

इमाम अबू हनीफा

और अल्लाह तआला ने फरमायाः {और बेशक तेरी तरफ भी और तुझ से पहले की तरफ भी वह्य की गई है कि अगर तू ने शिर्क किया तो बेशक तेरा अमल बर्बाद हो जायेगा और निश्चित रूप से तू नुक़सान उठाने वालों में से हो जायेगा,बल्कि तू अल्लाह ही की इबादत कर और शुक्रिया अदा करने वालों में से हो जा“।}[अज़्जु़मरः 65-66].

2- जो व्यक्ति अपने और अल्लाह के बीच किसी को वास्ता बना कर उन से दुआ करे और उन से शफाअत तलब करे,उन पर भरोसा करे और इबादत के ज़रिये उन की निकटता ढूँडे तो उस ने इस के ज़रिये लाइलाह इल्लल्लाह का खण्डन कर दिया.

3-ः जिस ने मुश्रिकों को काफिर नहीं कहा अथवा उन के कुफ्र में संदेह किया,या उन के धर्म को सत्य माना,उस ने कुफ्र किया क्योंकि जिस इस्लाम को उस ने स्वीकारा है उस में वह संदेह करने वाला हुआ जब कि अल्लाह तआला इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म से प्रसन्न नहीं हो सकता,तो जिस व्यक्ति ने उस आदमी के कुफ्र में संदेह किया जिस ने अल्लाह के अतिरिक्त की इबादत की,या इबादत की मामूली चीज़ भी उन की ओर फेरी,या यहूदो नसारा और मूर्ति की पूजा करने वालों के विषय में या उन के जहन्नमी होने के विषय में संदेह किया,या मुश्रिकीन के धर्मों और उन के उन कार्याें को सही माना जिन के कुफ्र की स्पष्ट दलील पाई जाती है तो उस ने कुफ्र किया।

4- जिस का यह विश्वास (एतक़ाद) हो कि नबी के अतिरिक्त का तरीक़ा नबी के तरीक़े से अध्िाक अच्छा है,और उन के अतिरिक्त का हुक्म नबी के हुक्म से अति उत्तम है,तो उस ने कुफ्र किया जैसे वह व्यक्ति जो अपने क़ानूनों और क़बायली नियमों को शरीअते इस्लामिया के हुक्म से बेहतर समझता है,या यह विश्वास रखता है कि इस के ज़रिये भी फैसला करना जायज़ है या ये भी इस्लामी शरीअत के समान है तो यह सब अल्लाह तआला के इनकार समान है,अल्लाह तआला के कथन के कारणः {और जो अल्लाह की उतारी हुयी वह्य की बिना पर फैसला न करें वे पूरा और मुकम्मल काफिर हैं“।}[अलमायदाः 44].

और अल्लाह तआला का यह फरमानः {तो क़सम है तेरे रब की यह ईमान वाले नहीं हो सकते जब तक कि सभी आपस के इख्तिलाफ में आप को फैसला करने वाला न क़बूल कर लें,फिर जो फैसला आप कर दें उन से अपने दिलों में ज़रा भी तंगी और नाखुशी न पायें और फरमांबरदार की तरह क़बूल कर लें“।}[अन्निसाः 65].

5- जिस ने रसूल की लायी हुयी किसी भी चीज़ को नापसंद किया अगरचे वह उस पर अमल कर रहा है फिर भी उस ने कुफ्र किया,अगर किसी ने नमाज़ को नापसंद किया तो उस ने कुफ्र किया अगरचे वह नमाज़ पढ़ता हो,क्यांेकि उस ने अल्लाह के आदेश से प्रेम नहीं किया,और ”लाइलाहा इल्लल्लाह की शर्तांें में से“ अल्लाह तआला की ओर से आयी हुयी हर चीज़ से प्रेम करना है,और जिस ने रसूल की लायी हुयी किसी भी चीज़ को नापसंद किया उस ने मुहम्मदुन रसूलुल्लाह (मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं) इस का हक़ अदा नहीं किया, क्यांेकि इस का तक़ाज़ा है कि जिन चीज़ों को रसूल लाये हैं उसे खुशी खुशी मान लिया जाये।

6- जिस ने अल्लाह के दीन से सम्बंधित किसी भी चीज़ का या उस के बदले और दंड का मज़ाक़ उड़ाया,उस ने कुफ्र किया,क्यांेकि उस ने इस दीन का और इसे लाने वाले का सम्मान नहीं किया,और इस लिये भी कि अल्लाह तआला ने उन मोमिनांे को काफिर माना है जिन्हों ने रसूल और आप के सहाबा का मज़ाक उड़ाया और उन्हों ने (सहाबा के बारे में कहा)ः हमने अपने इन क़ारियों जैसा नहीं देखा जो पेटू,झूटे और दुश्मानों के सामने बुज़दिल हैं,तो अल्लाह तआला ने उन के विषय में यह उताराः {अगर आप उन से पूछें तो साफ कह देंगे कि हम तो यूँ ही आपस में हंस बोल रहे थे,कह दीजिये कि अल्लाह,उस की आयतें और उस का रसूल ही तुम्हारी हंसी मज़ाक के लिये बाक़ी रह गये हैं,तुम बहाने न बनाओ,बेशक तुम अपने ईमान लाने के बाद काफिर हो गये“।}[अत्तोबाः 65-66].

अल्लाह तआला ने इन्हें काफिर कहा जब कि वे इस से पहले मुस्लिम थे और इस पर अल्लाह तआला का यह कथन प्रमाण हैः {तुम अपने ईमान लाने के बाद काफिर हो गये“।}[अत्तोबाः 66].

उन के इस कथनी से पहले उन्हें मोमिन कहा, और उन्हें काफिर क़रार दिया जब कि उन्हों ने जो कहा था उसे खेल और हंसी मज़ाक के तौर पर कहा था, इस से इन का उद्देश्य (मक़सद) यह था कि यह रास्ते की कठिनाइयों से मुक्ति पा जायें।

7- जादूः

मंन्न,(खास प्रकार का) झाड़ फूँक और गाँठ लगाने का नाम है जो शरीरों अथवा दिलों पर प्रभाव डालता है,इस से क़त्ल,और पति एवं पत्नी के बीच अलगाव हो जाता है,यह कार्य कुफ्र है,अल्लाह तआला ने कहाः {और वह निश्चित रूप से जानते हैं कि इस के लेने वाले का आखिरत में कोई हिस्सा नहीं है“।}
[अल बक़राः 102].

अर्थात नसीब,और उस से पहले कहाः {वह दोनों किसी व्यक्ति को उस वक़्त तक न सिखाते थे जब तक कि वे यह न कह दें कि हम तो एक परिक्षा हैं,तू कुफ्र न कर“।}[अल बक़राः 102].

और नबी ने फरमायाः «सात हलाक करने वाली चीज़ों से बचो, लोगों ने कहा ऐ अल्लाह के रसूल! वे क्या हैं? आप ने फरमायाः अल्लाह के साथ साझी बनाना,जादू,किसी ऐसे व्यक्ति को नाहक़ क़त्ल करना जिस का क़त्ल अल्लाह तआला ने हराम किया है,सूद खाना,यतीम का माल खाना,(काफिरों से) लड़ाई के दिन पीठ फेरना और भोली भाली पाकदामन औरम पर तुहमत लगाना।» (बुखारी),

और नबी ने फरमायाः «जिस ने किसी प्रकार की गाँठ लगाई, फिर उस में फूँक मारा तो उस ने जादू किया,और जिस ने जादू किया उस ने शिर्क किया,और जिस ने कोई चीज़ लटकाई उसे उस के हवाले कर दिया गया।» (नसाई).

और ज्योतिष और आकाशांे से ज़मीनी घटनाओं का अनुमान लगाना भी जादू है,अबू दाऊद की रिवायत के कारण,इब्ने अब्बास रजि़अल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है,नबी ने फरमायाः «जिस ने ज्योतिषी से ज्ञान प्राप्त किया उस ने जादू की एक शाखा सीखी,तो जितनी अधिक ज्योतिष सीखी उतना ही अधिक जादू सीखा।» (बैहक़ी),

और अल्लाह तआला ने फरमायाः {और जादूगर कहीं से भी आये कामयाब नहीं होता“।}[ताहाः 69].

और फेरना और झुकाना भी जादू है,अर्थात दो प्रेम करने वालों को एक दूसरे से फेर देना और दोनों को किसी और की तरफ झुका देना।

लाभदायक ज्ञान वह है जो बंदे को अल्लाह की तौहीद,और इन्सान की सेवा,अथवा उन के साथ भलाई करने पर उभारे.और हानिकार्क ज्ञान वह है जो बंदे को अल्लाह के साथ शिर्क करने और मानव को दुख देने और उन के साथ बुराई करने पर उभारे।

8- मुसलमानों के खेलाफ मुश्रिकों की सहायता और उन की मदद करना,और ये वही दोस्ती है जिस का बयान अल्लाह तआला के इस कथन में हैः {तुम में से जो कोई भी इन से दोस्ती करे तो वह उन में से है“}[अलमायदाः 51].

और वली (दोस्त बनना) और मुवालात(सहायता एवं मदद और मुहब्बत करने में) फकऱ् है, मुवालात अर्थात सहायता एवं मदद करने से मुराद यहाँ पर झुकाव,साथी बनाना और मुहब्बत करना है,और यह बडे़ गुनाहों में से तो है लेकिन कुफ्र नहीं है लेकिन वली और जि़म्मेदार बनने से मुराद मुसलमानों के खेलाफ दूसरों की सहायता करना और मुसलमानों के खेलाफ गै़रों के साथ मिल कर मुनाफिक़ों की तरह धोका दही करना है,इस लिये दुनियावी मामलों में मुश्रिकों के वली बनने वाले व्यक्ति का मामला अधिक खतरनाक है।

9-जो व्यक्ति यह खयाल करे कि मुहम्मदकी शरीअत हमारे ऊपर लागू नहीं है,हम उस से निकल सकते हैं,क्योंकि इस्लामी शरीअत जिसे देकर मुहम्मद को भेजा गया यह सब शरीअतों पर ग़ालिब और उसे खतम करने वाली है,और अल्लाह तआला इस्लाम के अतिरिक्त किसी चीज़ को नहीं स्वीकारता,अल्लाह तआला ने फरमायाः {बेशक अल्लाह के पास दीन इस्लाम ही है“।}[आले इमरानः 19].

और अल्लाह तआला ने फरमायाः {और जो इस्लाम के सिवाय किसी दूसरे दीन की खोज करे उस का दीन क़बूल नहीं होगा और वह आखिरत में घाटा उठाने वालों में होगा“।}[आले इमरानः 85].

और अल्लाह तआला ने फरमायाः {कह दीजिये! अगर तुम अल्लाह से मुहब्बत करते हो तो मेरी इŸोबा करो,खुद अल्ला तुम से मुहब्बत करेगा और तुम्हारे गुनाह माफ कर देगा और अल्लाह अधिक क्षमा करने वाला और दयावान है,कह दीजिये कि अल्लाह और रसूल के हुक्म की पैरवी करो,अगर वह मुंह फेर लें तो बेशक अल्लाह काफिरों को दोस्त नहीं रखता“।}[आले इमरानः 31-32].

और नबी ने फरमायाः «क़सम है उस ज़ात की जिस के हाथ में मुहम्मद की जान है इस उम्मत का कोई भी यहूदी और इसाई ऐसा नहीं जो मेरे विषय में सुने फिर वह बिना उन चीज़ों पर ईमान लाये मरजाये जिसे मैं देकर भेजा गया हूँ मगर वह जहन्नमी होगा» (मुस्लिम),

और इस की मिसालः कुछ जाहिलों का यह गुमान करना कि अवलिया को मुहम्मद की शरीअत से बाहर जाने की इजाज़त है तो यह वास्तविक कुफ्र अथवा इस्लाम से निकलना है।

अगर दिल अल्लाह की ओर मतवज्जेह और यकसू नहीं है और न उस के अतिरिक्त से विमुखता (एराज़) किये हुये है तो वह मुश्रिक होगा।

10- जिस ने अल्लाह के दीन से संक्षेप(इज्माली तौर) पर एराज़ किया और उस पर अमल नहीं किया तो उस ने कुफ्र किया,और जिस ने पूर्ण तरह से उस से एराज़ किया और जो उस के पास कुफ्र है उस को काफी समझा,और जब उसे इस्लाम या उस की तालीमात की ओर बुलाया जाये तो वह एराज़ करे और इनकार करे,या जान ले फिर उस पर अमल करने और उसे क़बूल करने से एराज़ करे तो उस ने कुफ्र किया।

यह तौहीद को तोड़ने वाली चीज़ें हैं,इस में इस बात से कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि कहने वाला वास्तव में कह रहा है या मज़ाक़ अथवा डर से कह रहा है,जब कि वे इस में ज्ञान और जान बूझ कर पड़ें, सिवाय उस व्यक्ति के जो मजबूरे महज़ हो तो वह केवल उन्हें अपनी जु़बान से जवाब दे (दिल से नहीं) अल्लाह तआला के इस फर्मान के कारणः {मगर जिसे मजबूर किया जाये और उस का दिल ईमान पर क़ायम हो,लेकिन जो लोग खुले दिल से कुफ्र करें“}[अन्नहलः 106].

जिसे कुफ्र पर मजबूर किया गया फिर उस ने उस पर अपनी प्रसन्नता से अमल किया तो उस ने कुफ्र किया, और जिस ने अपनी मौत से बचने के लिये कुफ्र किया जब कि ईमान पर उस का दिल संतुष्ट है तो वह बच गया,और उस पर कुछ गुनाह नहीं है, अल्लाह तआला के इस फर्मान के कारणः {लेकिन यह कि उन के (डर से) किसी प्रकार की हिफाज़त का इरादा हो“}
[आले इमरानः 28].

ज्ञान ऐसा पेड़ है जो अच्छे स्वभाव,नेक अमल, प्रशंसा,और अच्छी विशेषता का फल देता हैै,और जेहालत ऐसा पेड़ है जो हर प्रकार के बुरे स्वभाव और बुरी विशेषता का फल देता है।